लिंग से प्रकट होने वाले
उस अनंत अग्नि-स्तंभ से प्रकट होते शिव, जिसे न ब्रह्मा नाप सके, न विष्णु — वे प्रभु जिनका न आदि है, न अंत।
अन्य नाम: Liṅgodbhava-mūrti · Aruṇācaleśvara · Aṇṇāmalaiyār
उन्हें कैसे पहचानें
चित्र में देखने के लिए किसी पंक्ति पर जाएँ (या टैप करें)।
यह रूप क्या सिखाता है
लिंगोद्भव वे शिव हैं जैसे उन्होंने पहली बार देवताओं को स्वयं को दिखाया: किसी आकृति के रूप में नहीं, बल्कि ऐसे अग्नि-स्तंभ के रूप में जिसका न ऊपरी छोर था न निचला। मंदिर की पाषाण-मूर्ति उसी कथा का एक क्षण है — प्रकाश-स्तंभ से बाहर आते प्रभु, ताकि जो उसके छोर खोज रहे थे वे अंततः उनके दर्शन कर सकें।
शिव पुराण बताता है कि एक बार ब्रह्मा और विष्णु में विवाद हुआ कि दोनों में बड़ा कौन है। उनके अस्त्र दहक ही रहे थे कि दोनों के बीच एक विशाल अग्नि-स्तंभ प्रकट हुआ और सारे अस्त्र शांत हो गए। तय हुआ कि जो इसका छोर पा लेगा वही बड़ा होगा। विष्णु वराह बनकर नीचे खोदते गए; ब्रह्मा हंस बनकर ऊपर उड़े। किसी को अंत नहीं मिला। विष्णु ने लौटकर सच-सच कह दिया। ब्रह्मा गिरते हुए केतकी के फूल को साक्षी बनाकर लौटे और बोले कि उन्होंने ऊपरी छोर देख लिया है।
तब स्तंभ से शिव प्रकट हुए। उन्होंने विष्णु की सच्चाई का सम्मान किया, ब्रह्मा के झूठ पर उन्हें नीचा दिखाया, और केतकी से कहा कि मेरे सामने झूठ बोलने के कारण मैं तुम्हें धारण नहीं करूँगा — हाँ, मंडप आदि के रूप में तुम मेरे ऊपर रह सकोगी। पुराण यह भी कहता है कि इस प्राकट्य का दिन शिवरात्रि के रूप में मनाया जाएगा, और जहाँ वह लिंग अग्नि के पर्वत-सा खड़ा हुआ, वह स्थान अरुणाचल कहलाएगा।
परंपरा इस कथा को ईश्वर को जानने का पाठ मानती है। ऊपर उड़ता हंस — ऊँची उड़ान भरती बुद्धि — और नीचे खोदता वराह — गहराई तक जाता परिश्रम — दोनों सच्चे हैं, दोनों श्रेष्ठ हैं, फिर भी अपने बल से कोई भी अनंत का अंत नहीं पाता। शिव को प्रकट करता है माप नहीं, उनकी अपनी कृपा, जो सच्चाई से मिलती है। प्रशंसा उन्हीं विष्णु की होती है जिन्होंने माना कि उन्हें अंत नहीं मिला।
इसीलिए लिंग की ही पूजा होती है। पुराण के अनुसार वह अग्नि-स्तंभ ही पहला लिंग है: उस प्रभु का चिह्न जो रूप, आदि और अंत से परे हैं। तमिल मंदिरों में लिंगोद्भव की मूर्ति प्रायः गर्भगृह की बाहरी पिछली दीवार के आले में, भीतर स्थित लिंग के ठीक पीछे रखी जाती है — जिस वस्तु को कथा समझाती है, उसी के चारों ओर पत्थर में कही गई कथा।
भक्त इस रूप को विशेषकर महाशिवरात्रि पर याद करते हैं, जब बहुत से लोग प्रकाश-स्तंभ के सम्मान में रात भर जागते हैं; और तिरुवण्णामलै में, जहाँ हर वर्ष पहाड़ी पर कार्तिकै दीपम् जलाया जाता है — उस अग्नि के रूप में जिसका कोई अंत नहीं।
इस रूप की कथाएँ
कहाँ दर्शन करें
- अरुणाचलेश्वर मंदिरतिरुवण्णामलै, तमिलनाडु
पहाड़ी को ही अग्नि-लिंग माना जाता है; हर वर्ष उसके शिखर पर कार्तिकै दीपम् जलाया जाता है। शिव पुराण इसी कथा में इस स्थान को अरुणाचल नाम देता है।
- दशावतार गुफा (गुफा 15)एलोरा, महाराष्ट्र
गुफा के प्रमुख शैव उत्कीर्णनों में अग्नि-स्तंभ में शिव का फलक, हंस और वराह सहित।
स्रोत
निश्चित
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इस संदर्भ का मूल अंश अभी यहाँ नहीं जोड़ा गया है। ऊपर दिया स्थान और संस्करण देखें; कथा हमारे शब्दों में पुनर्कथन है।
शिव का केंद्रीय पुराण, सात संहिताओं में: विद्येश्वर, रुद्र (पाँच खंडों में), शतरुद्र, कोटिरुद्र, उमा, कैलास और वायवीय। अध्याय-संख्या संस्करणों में बदलती है; हमारे सभी संदर्भ गीताप्रेस के कल्याण शिवमहापुराणाङ्क के अनुसार हैं।
ग्रंथ-संग्रह में देखें →निश्चित
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लिंग के अर्थ और पूजा पर केंद्रित शैव पुराण।
ग्रंथ-संग्रह में देखें →से
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