पार्वती की गेंद
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दो दैत्य, जिन्हें कोई पुरुष नहीं मार सकता, शिव के गणों का वेश धरकर गेंद खेलती पार्वती का हरण करने उतरते हैं। शिव आँख से एक संकेत करते हैं; पार्वती एक बार गेंद फेंकती हैं, और वह गेंद काशी में लिंग बन जाती है।
दो दैत्य और उनका वर
सनत्कुमार व्यास को बताते हैं कि कैसे शिव ने एक बार केवल एक संकेत से दो दैत्यों को पहचनवा दिया और अपनी प्रिया के हाथों उनका वध कराया।
बहुत पहले विदल और उत्पल नाम के दो महाबली दैत्य थे। ब्रह्मा से उन्होंने यह वर पाया था कि कोई पुरुष उन्हें न मार सके, और इससे वे बड़े साहसी और अभिमानी हो गए। अपनी भुजाओं के बल पर वे तीनों लोकों को तिनके जैसा समझते थे, और युद्ध में उन्होंने सारे देवताओं को हरा दिया।
ब्रह्मा का वचन
हारे हुए देवता ब्रह्मा की शरण में गए, आदर से प्रणाम किया और अपना कष्ट सुनाया। ब्रह्मा ने उत्तर दिया: “ये दोनों निश्चय ही पार्वती के हाथों मारे जाएँगे। पार्वती सहित शिव का स्मरण करो और धैर्य रखो। भक्तों पर कृपा करने वाले परमेश्वर देवी के साथ बहुत शीघ्र तुम्हारा भला करेंगे।”
यह कहकर ब्रह्मा शिव का स्मरण करके मौन हो गए, और देवता आश्वस्त होकर अपने-अपने लोक को लौट गए।
नारद का आना
फिर शिव की प्रेरणा से देवर्षि नारद उन दैत्यों के घर गए और उनके सामने पार्वती के सौंदर्य का वर्णन किया।
दोनों ने सुना और फँस गए — माया से मोहित, कामना से पीड़ित, और पार्वती के हरण पर तुले हुए। वे सोचने लगे कि भाग्य उन्हें कब और कहाँ पार्वती तक पहुँचाएगा।
खेल
एक दिन शिव निश्चिंत होकर लीला-विहार कर रहे थे, और पार्वती मन बहलाने के लिए उनके पास ही अपनी सखियों के साथ गेंद खेलने लगीं।
पुराण इस दृश्य पर ठहरता है। वे गेंद को ऊपर उछालतीं, हर अंग में हल्की और फुर्तीली। उनकी साँस की सुगंध से खिंचे भौंरे उन्हें घेर लेते और उनकी आँखें चंचल हो उठतीं। खुले केशों से माला खिसक गई थी; गालों की पत्र-रचना पर पसीने की बूँदें थीं; चमकती चोली के भीतर से देह की कांति झलक रही थी। गेंद पर थाप देते-देते उनके कर-कमल लाल हो गए थे, और गेंद के पीछे दौड़ती दृष्टि के साथ उनकी भौंहें लता की कोंपलों-सी काँपती थीं। जगत की माता इस तरह खेलती दिखाई दीं।
आकाश में विचरते विदल और उत्पल ने तिरछी नज़र से उन्हें देखा — और पुराण कहता है, मानो सामने खड़ी मृत्यु ने ही दोनों को अपनी गोद में उठा लिया।
छद्म वेश और संकेत
ब्रह्मा के वर से गर्वित और कामदेव के बाणों से बिंधे वे दोनों देवी को हर लेना चाहते थे। उन्होंने झटपट अपनी माया रची, आकाश से उतरे, और छल से शिव के गणों का रूप बना लिया। उसी वेश में वे दोनों — अत्यंत दुराचारी और चंचल मन वाले — पार्वती के पास पहुँचे।
दुष्टों का नाश करने वाले शिव ने उनकी चंचल आँखों से पल भर में उन्हें पहचान लिया। उन्होंने संकट हरने वाली पार्वती की ओर देखा; वे समझ चुके थे कि ये दैत्य हैं, गण नहीं।
पार्वती अपने पति के नेत्रों का वह संकेत समझ गईं।
एक ही प्रहार
वह संकेत पढ़ते ही देवी ने — जो शिव की अर्धांगिनी हैं — उसी गेंद से, जिससे वे खेल रही थीं, दोनों पर एक साथ प्रहार कर दिया।
महादेवी की गेंद लगते ही वे दोनों महाबली दुष्ट चक्कर खाते हुए गिर पड़े — जैसे हवा के झोंके से ताड़ के गुच्छे से पके फल गिरते हैं, जैसे वज्र की चोट से सुमेरु पर्वत के शिखर ढह जाते हैं।
कंदुकेश्वर
घृणित काम में लगे उन दोनों दैत्यों को मारकर वह गेंद लिंग के रूप में बदल गई। तब से वह लिंग कंदुकेश्वर — “गेंद के ईश्वर” — नाम से प्रसिद्ध है। पुराण कहता है कि वह सब दोषों को दूर करता है और ज्येष्ठेश्वर के पास स्थित है।
यह जानकर कि शिव वहाँ प्रकट हुए हैं, विष्णु, ब्रह्मा, सारे देवता और ऋषि वहाँ आए। पार्वती सहित महादेव को देखकर उन्होंने हाथ जोड़े, प्रणाम किया और भक्ति से सुंदर वाणी में स्तुति की। फिर देवता और काशी के निवासी शिव से वर पाकर, उनकी आज्ञा से अपने स्थान को गए।
भक्तों पर कृपालु और उत्तम विहार के जानकार शिव ने पार्वती के साथ क्रीड़ा की और फिर प्रसन्न होकर अपने गणों के साथ अपने लोक को लौट गए।
काशी का कंदुकेश्वर नामक लिंग दुष्टों का नाश करता है, भोग और मोक्ष दोनों देता है और सज्जनों की कामना सदा पूरी करता है। जो इस अद्भुत चरित्र को प्रसन्न मन से सुनता या सुनाता है, पढ़ता या पढ़ाता है, उसे न दुःख होता है न भय; यहाँ सब उत्तम सुख भोगकर वह परलोक में ऐसी दिव्य गति पाता है जो देवताओं के लिए भी दुर्लभ है।
रुद्र संहिता का समापन
इसके साथ कथा पूरी होती है। पुराण कहता है कि सनत्कुमार ने व्यास से विदा ली, उनसे सम्मान पाया और आकाश-मार्ग से शीघ्र काशी चले गए।
तब ब्रह्मा नारद से कहते हैं कि उन्होंने युद्ध खंड और उसके साथ पूरी रुद्र संहिता सुना दी, जो शिव को प्रसन्न करती है और भोग तथा मोक्ष देती है; जो इसे नित्य पढ़ता है वह शत्रु-बाधा से छूटता है, सारे मनोरथ पाता है और अंत में मुक्ति। सूत जोड़ते हैं कि नारद अपने पिता से शिव का परम यश और उनके सौ नाम सुनकर कृतार्थ हुए और शिव के अनुयायी बन गए — और वे ऋषियों से पूछते हैं कि अब वे और क्या सुनना चाहते हैं।
कथा पूर्ण
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यह कथा कहाँ वर्णित है
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शिव का केंद्रीय पुराण, सात संहिताओं में: विद्येश्वर, रुद्र (पाँच खंडों में), शतरुद्र, कोटिरुद्र, उमा, कैलास और वायवीय। अध्याय-संख्या संस्करणों में बदलती है; हमारे सभी संदर्भ गीताप्रेस के कल्याण शिवमहापुराणाङ्क के अनुसार हैं।
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कथा के अलग-अलग रूप
- वर यह है कि कोई पुरुष इन दोनों दैत्यों को न मार सके; पुराण इस छिद्र को बिना समझाए छोड़ देता है — ब्रह्मा बस इतना कहते हैं कि पार्वती इन्हें मारेंगी।
- यह युद्ध खंड का और पूरी रुद्र संहिता का अंतिम अध्याय है, इसलिए इसके अंतिम श्लोक (59.37–42) कथा को नहीं, ब्रह्मा और नारद के लंबे संवाद को समाप्त करते हैं।
- अध्याय कंदुकेश्वर को काशी में ज्येष्ठेश्वर के पास बताता है — वही क्षेत्र जहाँ पिछले अध्याय का व्याघ्रेश्वर लिंग है।