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सतीविवाहदेवी दक्ष की पुत्री बनकर जन्म लेती हैं, वर्ष-भर के व्रत से कैलास के योगी को पाती हैं, और उनके साथ वृषभ पर विदा होती हैं

सती का विवाह

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ब्रह्मा की प्रार्थना पर देवी दक्ष और वीरिणी की पुत्री सती बनकर जन्म लेना स्वीकार करती हैं, ताकि एकाकी योगी शिव पत्नी ग्रहण करें। वर्ष-भर के नंदा-व्रत से वे शिव का वर पाती हैं, ब्रह्मा विवाह का प्रस्ताव लेकर जाते हैं, और दक्ष के घर विवाह होता है — जहाँ ब्रह्मा की अपनी चूक उनके प्राण संकट में डाल देती है और उन्हें ‘रुद्रशिर’ नाम देती है।

कथा कथा — नीचे दिए ग्रंथों के आधार पर, हमारे शब्दों में

देवी से दो प्रार्थनाएँ

यह कथा ब्रह्मा नारद को सुनाते हैं। ब्रह्मा के ललाट से रुद्र रूप में प्रकट हुए शिव कैलास पर योगी बनकर अकेले रहते थे — समाधि में लीन, न पत्नी, न उसकी चाह। ब्रह्मा चिंतित थे। शिव ने तो कभी उन्हें केवल स्त्री की इच्छा करने पर ही डाँटा था — ऐसे शिव विवाह क्यों करेंगे? और यदि न करें, तो सृष्टि ठीक से कैसे चलेगी?

इसलिए ब्रह्मा ने देवी दुर्गा की स्तुति की — शिव की प्रिया, चर-अचर सबकी शक्ति, तीनों गुणों से परे और फिर भी उनका कारण। वे योगनिद्रा चंडिका के रूप में प्रकट हुईं: चिकने अंजन-सी श्यामा, चतुर्भुजा, सिंहवाहिनी, केशों में मोती, मस्तक पर चंद्रमा, त्रिनेत्रा, शरद-पूर्णिमा-सा मुख। उन्होंने कहा — बताइए, मेरी स्तुति क्यों की? वह कार्य होगा।

ब्रह्मा ने अपनी चिंता कह दी। शिव का मन केवल आप ही मोह सकती हैं, उन्होंने कहा — न विष्णु, न लक्ष्मी, न कामदेव, न मैं। जैसे आप लक्ष्मी बनकर विष्णु को प्रसन्न करती हैं, वैसे ही दक्ष की पुत्री बनकर शिव की पत्नी बनिए। दक्ष इसी समय क्षीरसागर के उत्तरी तट पर आपके लिए तप कर रहे हैं।

देवी विस्मित हुईं। पुराण उनके मन की बात भी कहता है: स्वयं सृष्टिकर्ता को यह कैसा मोह हो गया कि वे निर्विकार प्रभु को अपना पुत्र और साधारण देवता समझकर मोहित करना चाहते हैं? शिव गुणों से परे हैं और मैं उनकी दासी हूँ। पर वर न दूँ तो वेद की मर्यादा टूटती है। उन्होंने मन में शिव का स्मरण किया, उनकी आज्ञा पाई और बोलीं — आपकी बात सच है। उन्हें कोई दूसरी स्त्री नहीं मोह सकती, और मुझमें भी अपने बल पर यह सामर्थ्य नहीं — फिर भी पूरे मन से प्रयत्न करूँगी। मैं दक्ष की पत्नी के गर्भ से सती बनकर जन्म लूँगी और अपनी लीला से उन्हें पाऊँगी।

उधर ब्रह्मा के कहने पर दक्ष ने क्षीरसागर के तट पर देवताओं के तीन हज़ार वर्ष तप किया — कभी पत्ते खाकर, कभी जल पीकर, कभी निराहार, कभी केवल वायु पर। अंत में देवी उनके सामने प्रकट हुईं — श्यामा, सिंहवाहिनी, चतुर्भुजा, हाथों में वर, अभय, नीलकमल और खड्ग। दक्ष ने वही माँगा जो ब्रह्मा ने माँगा था: मेरी पुत्री बनकर जन्म लीजिए और शिव की पत्नी बनिए। यह केवल मेरा स्वार्थ नहीं, उन्होंने कहा, सारे लोकों का है।

देवी मुस्कराईं और वचन दिया। मैं आपकी पुत्री बनूँगी, उन्होंने कहा, और कठोर तप से शिव का वर पाऊँगी — क्योंकि बिना तप के वे नहीं मिलते; वे हर जन्म में मेरे स्वामी हैं। फिर उन्होंने एक शर्त जोड़ी और कहा कि इसे सदा याद रखना: यदि आपने कभी मेरा अनादर किया, तो मैं यह शरीर त्याग दूँगी। मैं स्वतंत्र हूँ, दूसरा शरीर धारण कर लूँगी। यह कहकर वे अंतर्धान हो गईं और दक्ष आनंदित होकर घर लौटे।

दक्ष का घर-परिवार

दक्ष ने मन से सृष्टि आरंभ की, पर उनकी रची प्रजा बढ़ी नहीं। ब्रह्मा की सलाह पर उन्होंने पंचजन की पुत्री असिक्नी से विवाह किया — जिन्हें वीरण की पुत्री वीरिणी भी कहा गया है — ताकि सृष्टि मैथुन-धर्म से आगे बढ़े।

उनसे दक्ष के दस हज़ार पुत्र हुए — हर्यश्व। पिता ने उन्हें सृष्टि के लिए तप करने भेजा, तो वे पश्चिम में नारायणसर गए, जहाँ सिंधु समुद्र से मिलती है। नारद उनके पास आए और पूछा: पृथ्वी का विस्तार जाने बिना तुम सृष्टि कैसे करोगे? उन्होंने इस बात पर विचार किया, नारद की परिक्रमा की और निवृत्ति-मार्ग पकड़ लिया। उनके बाद हज़ार और पुत्र — शबलाश्व — भी उसी स्थान पर गए और उसी मार्ग पर चल पड़े।

शोक और क्रोध से भरे दक्ष ने नारद को शाप दिया: तुमने बालकों को देव, ऋषि और पितृ-ऋण चुकाने से पहले ही भटका दिया — जाओ, लोकों में घूमते हुए तुम्हारे पाँव कहीं टिकें नहीं। पुराण कहता है कि नारद ने बिना प्रतिवाद शाप स्वीकार कर लिया, जैसे सज्जन संसार का अपकार सह लेते हैं। ब्रह्मा आए, दक्ष को शांत किया और नारद को साथ ले गए।

इसके बाद दक्ष के साठ कन्याएँ हुईं। दस उन्होंने धर्म को दीं, तेरह कश्यप को, सत्ताईस चंद्रमा को, दो-दो अंगिरा और कृशाश्व को, और शेष तार्क्ष्य को; उन्हीं की संतानों से यह जगत भरा है। कोई सती को इन कन्याओं में सबसे बड़ी कहता है, कोई बीच की, कोई सबसे छोटी — और पुराण कहता है कि अलग-अलग कल्पों में तीनों बातें सही हैं।

फिर दक्ष और उनकी पत्नी ने हाथ जोड़कर देवी का ध्यान किया। देवी पहले दक्ष के मन में आईं और वहाँ से वीरिणी के गर्भ में निवास करने लगीं। वीरिणी तेजस्विनी और प्रसन्न हो उठीं। विष्णु और देवता आकर गर्भस्थ देवी को प्रणाम कर गए और भाग्यशाली माता-पिता की प्रशंसा कर गए।

दसवाँ मास पूरा होने पर, शुभ घड़ी में, चंद्र और ग्रहों के अनुकूल होने पर सती का जन्म हुआ। आकाश से फूल बरसे, मेघों ने जल बरसाया, दिशाएँ शांत हो गईं, देवताओं ने आकाश में बाजे बजाए और बुझी हुई यज्ञाग्नियाँ फिर जल उठीं। दक्ष ने तुरंत पहचान लिया कि यह कौन है और उनकी स्तुति की। देवी ने ऐसे उत्तर दिया कि केवल दक्ष सुनें, माता भी नहीं: आपकी कामना पूरी हुई — अब फिर तप कीजिए। फिर अपनी माया से वे शिशु बन गईं और रोने लगीं।

घर की स्त्रियाँ दौड़ी आईं और नगर उत्सव से गूँज उठा। विष्णु के साथ देवता आए और दक्ष-कन्या बनी देवी को प्रणाम किया। उनके कहने पर दक्ष ने सब गुणों से संपन्न उस कन्या का नाम उमा रखा; और मंगलकारी नाम बाद में पड़े।

मिट्टी के शिव गढ़ने वाली बालिका

वह शुक्लपक्ष के चंद्रमा की तरह बढ़ने लगी, और जैसे चंद्रमा में कलाएँ अपने-आप आती हैं वैसे ही उसमें सब गुण आ गए। सखियों के बीच खेलते हुए वह बार-बार शिव की प्रतिमाएँ बनाती। बच्चों के गीत गाती तो हर, रुद्र और काम को जीतने वाले स्थाणु का ही गुणगान करती। छोटी होकर भी वह माता-पिता की सेवा करती और घर के काम निपुणता से संभालती।

एक दिन ब्रह्मा नारद के साथ दक्ष के घर आए। सती ने दोनों को प्रणाम किया, और ब्रह्मा ने आशीर्वाद दिया: तुम्हें वही सर्वज्ञ प्रभु पति रूप में मिलें, जो तुम्हें चाहते हैं और जिन्हें तुम चाहती हो — जिन्होंने न कभी दूसरी पत्नी ली, न लेते हैं, न लेंगे, और जिनके समान कोई नहीं। यह सुनकर दक्ष निश्चिंत हो गए और पुत्री को परमेश्वरी मानकर आदर करने लगे।

यों वह बचपन पार कर युवावस्था में पहुँची। दक्ष सोचने लगे कि इसे शिव को कैसे दूँ। सती ने पिता का मन जान लिया; वह स्वयं भी शिव को चाहती थी। वह माता वीरिणी के पास गई और तप की आज्ञा माँगी। माता का आशीर्वाद पाकर उसने महेश्वर को पति रूप में पाने के लिए घर में ही व्रत आरंभ किया।

नंदा-व्रत

पुराण उसका व्रत महीने-दर-महीने बताता है। आश्विन में हर नंदा तिथि — प्रतिपदा, षष्ठी और एकादशी — पर उसने गुड़, भात और नमक से हर की पूजा की। कार्तिक की चतुर्दशी को खीर और पुओं से। मार्गशीर्ष कृष्ण अष्टमी को जौ, तिल और चावल से। पौष शुक्ल सप्तमी को रात-भर जागकर भोर में खिचड़ी से। माघ की पूर्णिमा को रात्रि-जागरण करके भोर में भीगे वस्त्रों में नदी-तट पर पूजा की।

फाल्गुन कृष्ण चतुर्दशी को उसने रात-भर जागकर हर प्रहर बिल्वपत्र और बिल्वफल से शिव की विशेष पूजा की। चैत्र शुक्ल चतुर्दशी को पलाश और दौने के फूलों से। वैशाख शुक्ल तृतीया को गाय से मिलने वाले पदार्थों, तिल, जौ और चावल से। ज्येष्ठ पूर्णिमा को उपवास रखकर रात में वस्त्र और भटकटैया के फूलों से; आषाढ़ शुक्ल चतुर्दशी को काले वस्त्र और उन्हीं फूलों से। श्रावण शुक्ल अष्टमी और चतुर्दशी को यज्ञोपवीत और वस्त्रों से। भाद्रपद कृष्ण चतुर्दशी को अनेक फूलों और फलों से — और चतुर्दशी के दिन वह केवल जल लेती थी।

हर महीने वह थोड़ा खाती, नाम जपती और उस ऋतु के फूल, फल और अन्न शिव को अर्पित करती। नंदा-व्रत पूरा होने पर वह एकाग्र होकर केवल शिव के ध्यान में निश्चल बैठ गई।

विष्णु और ब्रह्मा को आगे करके देवता और ऋषि उसका तप देखने आए। पुराण कहता है कि वह साक्षात् सिद्धि जैसी दिख रही थी। उन्होंने हाथ जोड़कर उसे प्रणाम किया, उसके तप की सराहना की, और सीधे कैलास चले गए — लक्ष्मी के साथ विष्णु और सावित्री के साथ ब्रह्मा। वहाँ उन्होंने शिव की लंबी स्तुति की: सबके साक्षी, प्रकृति और पुरुष से परे, न देवता न असुर, न पुरुष न स्त्री — वेद जब हर वस्तु को ‘यह नहीं’ कह देता है, तब जो शेष रहता है, वही।

शिव की शर्तें

स्तुति से प्रसन्न होकर शिव हँसे और आने का कारण पूछा। विष्णु के कहने पर ब्रह्मा बोले। हम तीनों मिलकर काम करते हैं, उन्होंने कहा, और एक-दूसरे की सहायता न करें तो जगत टिक नहीं सकता। असुर जन्म लेंगे — कुछ मेरे हाथों मरेंगे, कुछ विष्णु के, कुछ आपके, कुछ आपके पुत्र के, कुछ आपकी माया से। पर आप राग-द्वेष से मुक्त और दयालु हैं; हो सकता है आप उन्हें मारना ही न चाहें। हम वास्तव में एक हैं, केवल कार्य के कारण तीन बने हैं। विष्णु और मैंने इसी कार्य के लिए पत्नियाँ ग्रहण की हैं। आप भी सहचरी ग्रहण करें, जैसे लक्ष्मी विष्णु की और सावित्री मेरी हैं।

और याद कीजिए, ब्रह्मा ने आगे कहा, आपने स्वयं हमसे कहा था कि मेरे शरीर से आपका एक रूप रुद्र नाम से प्रकट होगा, और वह रुद्र विवाह करके लोक का उत्तम कार्य करेगा। अपना वचन निभाइए।

शिव ने मुस्कराकर उत्तर दिया। आप दोनों मुझे प्रिय हैं और आपकी बात का वज़न है। पर मैं योगी हूँ, संसार से विरक्त, अपनी आत्मा में रमने वाला, अवधूत, संसार जिसे अमंगल वेश कहता है उसे धारण करने वाला। पत्नी का मैं क्या करूँगा? विवाह बड़ा बंधन है। फिर भी मैं सदा अपने भक्तों के अधीन हूँ, और अपना वचन रखने के लिए विवाह करूँगा।

फिर उन्होंने बताया कि कैसी पत्नी उन्हें स्वीकार होगी। वह मेरे तेज का एक भाग धारण कर सके। जब मैं योग में रहूँ तो वह योगिनी बने, जब प्रेम में रहूँ तो प्रेममयी पत्नी। मैं सदा सनातन शिव-तत्त्व का चिंतन करता हूँ; जो स्त्री उसमें बाधा डाले, वह मेरी पत्नी नहीं हो सकती। और एक शर्त और: यदि उसने कभी मुझ पर या मेरी बात पर अविश्वास किया, तो मैं उसे त्याग दूँगा।

ब्रह्मा और विष्णु ने एक-दूसरे की ओर देखकर मुस्कराए। ऐसी स्त्री तो पहले से है, ब्रह्मा बोले। देवी उमा जगत के कार्य के लिए बार-बार रूप लेती हैं — विष्णु के लिए लक्ष्मी, मेरे लिए सरस्वती — और अब तीसरे रूप में दक्ष-पुत्री सती बनकर आई हैं। इस समय वे आपको पाने के लिए तप कर रही हैं। जाइए, उन्हें वर दीजिए और उनसे विवाह कीजिए। विष्णु ने जोड़ा: ब्रह्मा की बात को मेरी ही बात समझिए। शिव हँसे और बोले — तथास्तु।

वरदान, और एक दूत

सती ने आश्विन शुक्ल अष्टमी को उपवास रखकर शिव की पूजा की। व्रत पूरा होते-होते, जब नवमी का कुछ भाग शेष था, ध्यान में बैठी सती के सामने शिव प्रकट हुए: गौरवर्ण और सुंदर, पाँच मुख और हर मुख में तीन नेत्र, भाल पर चंद्रमा, नीला कंठ, चार भुजाओं में त्रिशूल, ब्रह्मकपाल, वर और अभय मुद्रा, भस्म से लिपटे, मस्तक पर गंगा, करोड़ों चंद्रमाओं जैसे तेजस्वी।

सती ने लज्जा से आँखें झुकाकर उनके चरणों में प्रणाम किया। वर माँगो, शिव ने कहा — जानते हुए भी कि वह क्या चाहती है, पर उसके मुख से सुनना चाहते हुए। वह कुछ बोल न सकी; उसकी इच्छा लज्जा में ढँकी रह गई। वर माँगो, वर माँगो, शिव बार-बार कहते रहे। अंत में वह इतना ही कह पाई: मुझे मनचाहा वर दीजिए, जो कभी न टले। उसे बात पूरी न कर पाते देख शिव ने स्वयं कहा: तुम मेरी पत्नी बनो।

वह चुपचाप मुस्कराती खड़ी रही, और दोनों के हृदय में प्रेम उतर आया। शिव की स्फटिक-सी धवलता के पास अंजन-सी श्यामा सती ऐसी लगीं जैसे चंद्रमा के पास मेघ की रेखा। फिर उसने हाथ जोड़कर एक बात और माँगी: मेरे पिता के सामने विधिपूर्वक विवाह करके मुझे ग्रहण कीजिए। ऐसा ही होगा, शिव ने कहा। सती माँ के पास घर लौटीं और शिव हिमालय के शिखर पर अपने आश्रम गए — जहाँ, पुराण कहता है, सती के वियोग में उनसे ध्यान भी मुश्किल से लगता था।

लोक-रीति अपनाकर शिव ने ब्रह्मा का स्मरण किया, और ब्रह्मा सरस्वती के साथ आ पहुँचे। जब से मैंने विवाह का मन बनाया है, शिव ने स्वीकार किया, यह मेरा अपना ही प्रयोजन बन गया है। दक्ष के पास जाइए और ऐसा कीजिए कि वे जल्दी अपनी पुत्री मुझे दें; यह वियोग मिटाइए। यह तो तय हो चुका है, ब्रह्मा ने आश्वासन दिया, और अपने वेगवान रथ से दक्ष के घर चल पड़े।

घर पहुँचकर सती ने माता-पिता को प्रणाम किया था और एक सखी से कहलवाया था कि शिव ने कैसे उसे मनचाहा वर दिया। दक्ष और वीरिणी आनंदित हुए, ब्राह्मणों, अंधों और दीनों को दान दिया; वीरिणी ने पुत्री को हृदय से लगाकर उसका सिर सूँघा। पर कुछ समय बाद दक्ष चिंता में पड़ गए। शिव वर देने आए और चले गए — अब फिर कैसे आएँगे? किसी को उनके पास भेजूँ और वे मना कर दें, तो मेरी याचना व्यर्थ जाएगी। क्या मैं स्वयं उनकी पूजा करूँ, जब तक वे आकर इसे ग्रहण न कर लें?

तभी ब्रह्मा सरस्वती के साथ आ पहुँचे। तुम्हारी पुत्री के वर का समय आ गया है, उन्होंने दक्ष से कहा। शिव ने मुझे उसके लिए भेजा है। जिन्हें कामदेव अपने सारे पुष्प-बाणों से भी नहीं बेध सका, वे अब बिंधकर साधारण प्राणी की तरह व्याकुल हैं। सुनी हुई बात भूल जाते हैं; अपने गणों के सामने ही पूछते हैं — सती कहाँ है? जैसे सती ने व्रत से उनकी आराधना की, वैसे ही अब वे हिमालय पर बैठकर उसकी आराधना कर रहे हैं। बिना देर किए उसे उन्हें दे दो। मैं नारद के साथ उन्हें यहाँ लाऊँगा। दक्ष ने प्रसन्न होकर स्वीकार किया।

दक्ष के घर विवाह

ब्रह्मा कैलास लौटे। उत्सुक वर की भूमिका निभाते हुए शिव ने तुरंत पूछा: दक्ष ने क्या कहा? यह वियोग मेरा हृदय चीर रहा है। ब्रह्मा ने दक्ष का संदेश सुनाया: मेरी पुत्री उन्हीं के लिए जन्मी है; वे शुभ मुहूर्त में आएँ, मैं उसे भिक्षा के रूप में उनके हाथों में दूँगा। तो मैं आपके और नारद के साथ चलूँगा, शिव ने कहा, और आपके मानस-पुत्र मरीचि आदि के साथ, और अपने गणों के साथ।

ब्रह्मा ने नारद और अपने पुत्रों का स्मरण किया, और वे तुरंत आ गए। विष्णु गरुड़ पर लक्ष्मी और अपने पार्षदों के साथ आए। चैत्र शुक्ल त्रयोदशी, रविवार, पूर्वाफाल्गुनी नक्षत्र में शिव ने यात्रा की। गज, वृषभ, बाघ, सर्प, जटा और चंद्रकला — सब उनके लिए यथायोग्य आभूषण बन गए। वेगवान बैल पर सवार, देवताओं, मुनियों और आनंदमग्न प्रमथों से घिरे वे क्षण-भर में दक्ष के घर पहुँच गए।

रोमांचित दक्ष अगवानी को आगे आए। उन्होंने सब देवताओं का सत्कार किया, शिव को भीतर ले जाकर उत्तम आसन दिया और स्वयं उनकी पूजा की, फिर विष्णु, ब्रह्मा, ब्राह्मणों, देवताओं और गणों की। मरीचि आदि मुनियों से मंत्रणा करके उन्होंने ब्रह्मा से विवाह कराने को कहा। ग्रहों के बल से युक्त शुभ मुहूर्त में दक्ष ने सती को शिव को सौंपा, और शिव ने उसका पाणिग्रहण किया। नाच-गाना हुआ, और सब कुछ मंगलमय हो गया।

दक्ष ने शिव को बहुत-से उपहार दिए। फिर विष्णु हाथ जोड़कर शिव के सामने खड़े हुए। आप जगत के पिता हैं, उन्होंने कहा, और सती जगत की माता। आप श्यामा सती के साथ वैसे ही शोभते हैं जैसे मैं, श्याम, गौरी लक्ष्मी के साथ। इनके साथ मिलकर देवताओं और सज्जनों की रक्षा कीजिए। और एक विनती है: जो कोई सती को कामना से देखे, या उनके बारे में सुनकर कामना करे, उसका वध कीजिए। शिव हँसे और बोले — ऐसा ही होगा। विष्णु अपने स्थान पर लौट गए और यह बात गुप्त रखी।

ब्रह्मा की चूक, और ‘रुद्रशिर’ नाम

फिर ब्रह्मा ने गृह्यसूत्र की विधि से अग्नि-कर्म कराया, और शिव तथा सती ने अग्नि की प्रदक्षिणा की। यहाँ ब्रह्मा नारद को अपने ही विरुद्ध एक अद्भुत घटना सुनाते हैं। शिव की माया देवता, असुर और मनुष्य — सबको मोह लेती है। मैं कभी छल से शिव को मोहित करना चाहता था, वे कहते हैं — और शिव ने अपनी लीला से मुझे ही मोहित कर दिया। जो दूसरे का अपकार चाहता है, पहले उसी का अपकार होता है।

अग्नि की परिक्रमा करती सती के चरण वस्त्र से बाहर दिखे, और उस माया से मोहित ब्रह्मा ने उन्हें कामना से देखा। उनका ढँका मुख देखने के लिए उन्होंने अग्नि में गीली लकड़ी डाल दी, और घने धुएँ से वेदी छिप गई। धुएँ से जलती आँखें शिव ने हाथों से ढँक लीं, और ब्रह्मा ने घूँघट हटाकर सती का मुख देखा और अपना संयम खो बैठे। फिर लज्जित और भयभीत होकर चुप हो गए।

शिव ने अपनी दिव्य दृष्टि से सब देख लिया। पापी, उन्होंने कहा, मेरे ही विवाह में तुमने मेरी पत्नी को कामना से क्यों देखा? क्या सोचा था कि मुझे पता नहीं चलेगा? जैसे तिल के हर अंश में तेल है, वैसे ही मैं हर चर-अचर में हूँ। विष्णु की विनती याद करके उन्होंने ब्रह्मा को मारने के लिए त्रिशूल उठाया। मरीचि आदि ऋषि हाहाकार कर उठे; देवता डरकर शिव की स्तुति करने लगे; दक्ष दोनों हाथ उठाकर आगे दौड़े — ऐसा मत कीजिए, ऐसा मत कीजिए!

शिव नहीं माने: मैंने विष्णु को वचन दिया था, और उसे निभाऊँगा। तब विष्णु उनके आगे आ खड़े हुए। ब्रह्मा का वध न करें, उन्होंने विनती की। ये आपकी शरण में हैं। ये सृष्टि के लिए जन्मे हैं; ये न रहे तो वह कार्य कौन करेगा? और इन्हीं ने शिवा को सती के रूप में आपकी पत्नी बनने के लिए अवतरित कराया। शिव ने कहा: मैं स्वयं सारी प्रजा रचूँगा, या अपने तेज से कोई दूसरा सृष्टिकर्ता उत्पन्न कर दूँगा।

विष्णु मुस्कराए। प्रभु, प्रतिज्ञा दूसरे पर पूरी की जाती है — अपने ऊपर नहीं। हम तीनों आपकी ही आत्मा हैं, पराए नहीं। ब्रह्मा मेरी आत्मा कैसे, शिव ने पूछा, जब वे सामने मुझसे साफ़ अलग बैठे हैं? तब विष्णु ने, शिव की ही इच्छा से, सबको सुनाते हुए शिव-तत्त्व कहा: हम तीनों आप ही के — उस एक ज्योति के — अंश हैं, जैसे सिर और गर्दन एक ही शरीर के अंग; स्वयंप्रकाश, पुरातन, अव्यक्त, अनंत ब्रह्म आप ही हैं, और सब कुछ आपसे ही प्रकट हुआ है। शिव प्रसन्न हुए, और ब्रह्मा बच गए।

सबने चैन की साँस ली और शिव की स्तुति की। तब शिव ने ब्रह्मा से कहा: मैं प्रसन्न हूँ, डरिए मत। अपने हाथ से अपना सिर छुइए। ब्रह्मा ने छुआ — और उसी क्षण उनके सिर पर शिव का अपना रूप विराजमान दिखाई दिया। इंद्र आदि देवता देखते रहे, और ब्रह्मा लज्जा से मुख झुकाए खड़े रहे; उन्होंने क्षमा और प्रायश्चित्त माँगा।

इसी रूप में, मेरे अधिष्ठान के साथ, तप करो, शिव ने कहा; पृथ्वी पर तुम ‘रुद्रशिर’ नाम से प्रसिद्ध होगे और ब्राह्मणों के कार्य सिद्ध करोगे। तुम्हारी चूक मनुष्यों जैसी थी, इसलिए मनुष्य बनकर पृथ्वी पर विचरो। जो तुम्हें देखकर अचरज से पूछेगा कि ब्रह्मा के सिर पर शिव कैसे, और पूरी कथा सुनेगा, वह पराई स्त्री से जुड़े पाप से मुक्त होगा — और लोग जितनी बार तुम्हारी भूल कहेंगे, तुम उतने ही शुद्ध होते जाओगे। यह प्रायश्चित्त, शिव ने कहा, लोगों की हँसी और निंदा सहना है।

पुराण आगे कहता है कि वेदी के पास ब्रह्मा की उस चूक से आकाश में प्रलय के चार महामेघ उठे — संवर्त, आवर्त, पुष्कर और द्रोण — जो भयंकर गर्जना करते हुए थोड़ा-सा जल बरसाने लगे। जब उन्होंने आकाश ढँक लिया, तब शिव और सती शांत हुए। भय मिटने पर ब्रह्मा ने शिव की आज्ञा से विवाह के शेष कर्म पूरे किए।

कैलास की ओर

देवताओं ने शिव और शिवा के मस्तक पर फूल बरसाए, बाजे बजे, ब्राह्मणों ने वेदपाठ किया, और रंभा आदि अप्सराएँ नाचीं। तब शिव ने लोक-रीति से हाथ जोड़कर ब्रह्मा से कहा: आप इस विवाह के आचार्य रहे और इसे भली-भाँति संपन्न किया। मैं आपको क्या दक्षिणा दूँ? कुछ भी माँगिए, चाहे कितना ही दुर्लभ हो।

ब्रह्मा ने सबका हित माँगा। लोगों के पाप धोने के लिए इसी रूप में सदा इस वेदी पर विराजिए, और मुझे अपने समीप आश्रम बनाकर अपनी भूल के लिए तप करने दीजिए। चैत्र शुक्ल त्रयोदशी को, रविवार और पूर्वाफाल्गुनी नक्षत्र में, जो यहाँ भक्ति से आपके दर्शन करे, उसके पाप नष्ट हों, पुण्य बढ़े और रोग मिटें; और जो स्त्री दुर्भागी, संतानहीन, कानी या रूपहीन हो, वह आपके दर्शन मात्र से दोषमुक्त हो जाए। तथास्तु, शिव ने कहा, और पत्नी सहित अपनी एक अंश-मूर्ति प्रकट करके वेदी के बीच विराजमान कर दी।

फिर शिव ने दक्ष से विदा ली। दक्ष ने झुककर उनकी स्तुति की, और देवता, मुनि और गण जय-जयकार कर उठे। शिव ने सती को वृषभ पर बिठाया और स्वयं भी सवार हुए। उनके पास मुस्कराती बैठी सती चंद्रमा में दिखने वाली श्याम छाया जैसी लग रही थीं। विष्णु, देवता, मरीचि आदि ऋषि, दक्ष तक — सब चित्र-लिखे-से मुग्ध खड़े रहे। कुछ बाजे बजाते, कुछ शिव का यश गाते पीछे-पीछे चले।

आधे मार्ग में शिव ने प्रेम से दक्ष को लौटा दिया। उन्होंने देवताओं को भी विदा किया, पर वे प्रेमवश कैलास तक साथ चले आए, जहाँ शिव ने उनका सम्मान करके उन्हें घर भेजा। और वहाँ, अपने पर्वत पर, लोक-रीति निभाते हुए शिव दक्ष-कन्या के साथ आनंद से रहने लगे।

ब्रह्मा कहते हैं कि स्वायंभुव मन्वंतर में शिव का विवाह इसी प्रकार हुआ। पुराण का वचन है कि जो विवाह, यज्ञ या किसी भी शुभ कार्य के आरंभ में शिव की पूजा करके शांत मन से यह कथा सुने, उसका कार्य निर्विघ्न पूरा होता है; और जो कन्या इसे प्रेम से सुने, उसे सुख, सौभाग्य, शील और सुखी, संतानवाला दांपत्य मिलता है।

॥ इति ॥

कथा पूर्ण

अर्पण

जो मन में है, अर्पित करें

विचार

आपके मन में क्या रह गया?

एक पंक्ति, एक स्मृति, एक प्रश्न — इसने आपके मन में जो जगाया, वह साझा कीजिए। हर विचार प्रकाशित होने से पहले पढ़ा जाता है।

यह कथा कहाँ वर्णित है

अध्याय
निश्चित
शिव पुराण
रुद्र संहिता, सती खंड, अध्याय 11–13 (ब्रह्मा द्वारा देवी-स्तुति: 11.3–16; उनकी विनती: 11.20–31; देवी का विचार और वचन: 11.32–49; दक्ष का तप: 12.4–12; देवी का वचन और चेतावनी: 12.25–35; असिक्नी से विवाह: 13.6–9; हर्यश्व और शबलाश्व: 13.10–28; नारद को शाप: 13.33–40)
क्रमांकन: गीताप्रेस, गोरखपुर — कल्याण श्रीशिवमहापुराणाङ्क (श्लोकाङ्क सहित हिन्दी अनुवाद)
अध्याय
निश्चित
शिव पुराण
रुद्र संहिता, सती खंड, अध्याय 14–15 (साठ कन्याएँ: 14.4–9; सती का गर्भ और जन्म: 14.10–26; दक्ष की स्तुति और देवी का एकांत वचन: 14.27–40; उमा नाम: 14.49–50; बाल्यकाल: 14.53–59; ब्रह्मा का आशीर्वाद: 15.1–7; नंदा-व्रत: 15.11–28; देवता तप देखते हैं और शिव-स्तुति: 15.29–67)
क्रमांकन: गीताप्रेस, गोरखपुर — कल्याण श्रीशिवमहापुराणाङ्क (श्लोकाङ्क सहित हिन्दी अनुवाद)
अध्याय
निश्चित
शिव पुराण
रुद्र संहिता, सती खंड, अध्याय 16–17 (ब्रह्मा की विनती: 16.5–26; शिव की अनिच्छा और शर्तें: 16.27–44; सती का प्रस्ताव: 16.46–57; शिव का प्राकट्य और वर: 17.2–23; शिव ब्रह्मा को भेजते हैं: 17.26–41; घर में सती और दक्ष की चिंता: 17.43–52; ब्रह्मा दक्ष को मनाते हैं: 17.53–73)
क्रमांकन: गीताप्रेस, गोरखपुर — कल्याण श्रीशिवमहापुराणाङ्क (श्लोकाङ्क सहित हिन्दी अनुवाद)
अध्याय
निश्चित
शिव पुराण
रुद्र संहिता, सती खंड, अध्याय 18–20 (बारात: 18.14–24; विवाह: 18.25–37; विष्णु की विनती: 19.2–9; ब्रह्मा की चूक: 19.13–30; उठा हुआ त्रिशूल: 19.31–45; विष्णु की विनती और उपदेश: 19.48–76; रुद्रशिर: 20.7–20; चार मेघ: 20.21–27; ब्रह्मा की दक्षिणा और वेदी पर शिव: 20.31–43; कैलास के लिए प्रस्थान: 20.44–57; फलश्रुति: 20.58–61)
क्रमांकन: गीताप्रेस, गोरखपुर — कल्याण श्रीशिवमहापुराणाङ्क (श्लोकाङ्क सहित हिन्दी अनुवाद)
अध्याय
निश्चित
भागवत पुराण
स्कंध 4, अध्याय 1 (प्रसूति से दक्ष की कन्याएँ; सती का भव से विवाह)
अध्याय
निश्चित
भागवत पुराण
स्कंध 6, अध्याय 5 (हर्यश्व, शबलाश्व और दक्ष का नारद को शाप)

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कथा के अलग-अलग रूप

  • भागवत पुराण सती को उन सोलह कन्याओं में गिनता है जो दक्ष को स्वायंभुव मनु की पुत्री प्रसूति से हुईं, और भव से उनके विवाह को एक पंक्ति में कह देता है। शिव पुराण उन्हें असिक्नी (वीरिणी) से जन्मी दक्ष की साठ कन्याओं में रखता है — और स्वयं मानता है कि कोई उन्हें सबसे बड़ी, कोई बीच की, कोई सबसे छोटी कहता है, और हर बात किसी न किसी कल्प में सही है।
  • हर्यश्वों और शबलाश्वों की कथा, और नारद को सदा भटकते रहने का दक्ष का शाप, भागवत (6.5) में भी है। शिव पुराण इसे सती की कथा में उसी घर के हिस्से के रूप में बुनता है जिसमें वे जन्म लेती हैं।
  • पुराण शुरुआत में ही सती के अंत के बीज चुपचाप बो देता है: देवी दक्ष को चेताती हैं कि अनादर हुआ तो वे शरीर त्याग देंगी, और शिव कहते हैं कि जो पत्नी उनकी बात पर अविश्वास करेगी उसे वे छोड़ देंगे। दोनों चेतावनियाँ आगे सती खंड में ही सच होती हैं। जन्म पर दक्ष उनका नाम उमा भी रखते हैं — वही नाम जो यही देवी पार्वती रूप में फिर धारण करती हैं।
  • विवाह में ब्रह्मा वाला प्रसंग पुराण की अपनी सीख है, जिसे ब्रह्मा स्वयं अपने विरुद्ध सुनाते हैं: वे कभी शिव को मोहित करना चाहते थे, और स्वयं मोहित हो गए। यह विवाह-वेदी पर शिव-सती के रूप और चैत्र शुक्ल त्रयोदशी की पवित्रता की उत्पत्ति-कथा भी है।