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चञ्चुला · बिन्दुगएक स्त्री एक कथा सुनकर डर से सच्ची हो जाती है, उसी से मुक्त होती है — और फिर अपने पति के लिए लौटती है

चंचुला और बिंदुग

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बाष्कल गाँव में ब्राह्मण बिंदुग अपनी पत्नी चंचुला को छोड़कर एक गणिका के पास रहने लगता है; बरसों तक टिके रहने के बाद चंचुला भी भटक जाती है, और दोनों एक साझे कुकर्म में बस जाते हैं। बिंदुग मरकर विंध्य पर्वत पर पिशाच बनता है। चंचुला गोकर्ण में शिव पुराण सुनकर पश्चात्ताप से भर उठती है, एक ब्राह्मण गुरु से पूरा पुराण सुनती है, और पार्वती की सखी बनकर शिवलोक पहुँचती है — और वहाँ देवी से अपने पति के उद्धार की प्रार्थना करती है, जिसे गंधर्व तुंबुरु बँधे हुए पिशाच को पुराण सुनाकर पूरा करते हैं।

मेरी कथाएँ
कथा कथा — नीचे दिए ग्रंथों के आधार पर, हमारे शब्दों में

बाष्कल गाँव

देवराज की कथा से प्रसन्न होकर शौनक जी सूत जी से एक और कथा माँगते हैं जो शिव में प्रेम बढ़ाए। अमृत पीने वालों को उससे मुक्ति नहीं मिलती, वे कहते हैं, पर शिव-कथा का अमृत सीधे मुक्ति देता है। सूत जी एक ऐसी बात सुनाने को तैयार होते हैं जिसे वे गोपनीय कहते हैं, क्योंकि शौनक शिव-भक्तों में अग्रणी हैं।

समुद्र के पास, वे कहते हैं, बाष्कल नाम का एक गाँव है। वहाँ रहने वाले द्विज वैदिक मार्ग से हट चुके हैं। उनका मन केवल भोग में लगा रहता है; वे न देवताओं पर भरोसा करते हैं न भाग्य पर; उनका व्यवहार टेढ़ा है, वे खेती करते हैं, तरह-तरह के घातक हथियार रखते हैं और पराई स्त्रियों के पीछे जाते हैं। ज्ञान, वैराग्य और सच्चे धर्म को वे बिल्कुल नहीं जानते।

वहाँ के दूसरे वर्णों के लोग भी वैसे ही हैं, भोग में डूबे और अपने कर्तव्यों से बेपरवाह, और गाँव की स्त्रियाँ भी मनमानी करने वाली और सदाचार से दूर हैं। ऐसा था वह स्थान।

बिंदुग और चंचुला

उसी गाँव में बिंदुग नाम का एक ब्राह्मण रहता था, जो अधम और पापी था। उसकी पत्नी चंचुला सुंदर थी और निष्ठा से अपने धर्म पर चलती थी। फिर भी वह उसे छोड़कर, कामना के वश में, एक गणिका के पास जाने लगा।

इसी तरह बहुत बरस बीत गए। चंचुला अकेलेपन में कष्ट पाती रही, पर अपने धर्म के नाश के डर से उसने सब सहा और लंबे समय तक नहीं डिगी। पर अंत में, अपनी तड़प से हारकर और पति के आचरण के असर में आकर, वह भी भटक गई। वह पति से छिपाकर रात में चोरी-छिपे एक दूसरे पुरुष से मिलने लगी।

एक रात बिंदुग ने उसे उसके साथ देख लिया। वह क्रोध में उनकी ओर दौड़ा; वह आदमी भाग गया। बिंदुग ने पत्नी को पकड़ा, उसे डाँटा और बार-बार घूँसों से मारा।

मार खाकर चंचुला को क्रोध आ गया और उसने निडर होकर उत्तर दिया। तुमने मुझे छोड़ दिया, उसने कहा — एक युवा पत्नी को, जो तुम्हीं में लगी थी — और तुम रोज़ अपनी मर्ज़ी से गणिका के पास जाते हो। तुम्हीं बताओ, पति की छोड़ी हुई युवती का क्या हाल होता है। मैं यह कैसे सहती?

समझौता

बिंदुग ने, जिसे सूत जी मूर्ख और ब्राह्मणों में अधम कहते हैं, माना कि उसकी बात सच है। फिर उसने एक प्रस्ताव रखा। डर छोड़ो, उसने कहा, और वह सुनो जिसमें हम दोनों का लाभ है। बेखटके दूसरे पुरुषों के साथ जाओ। उन्हें प्रसन्न करके उनसे धन निकालो — और वह सारा मुझे दे दिया करो, क्योंकि मेरा मन गणिका में लगा है। इस तरह हम दोनों का मतलब सध जाएगा।

चंचुला ने यह सुना, प्रसन्न हुई और मान गई। इस तरह पति-पत्नी में समझौता हो गया, और दोनों बिना किसी डर के कुकर्म में लग गए। पुराण कहता है कि उनके जीवन का बहुत-सा समय इसी तरह व्यर्थ गया।

समय आने पर बिंदुग मर गया और नरक में जा गिरा। वहाँ बहुत लंबे समय तक दुख भोगकर वह विंध्य पर्वत पर एक भयंकर पिशाच बना।

चंचुला बहुत बरसों तक अपने पुत्रों के साथ अपने ही घर में रही और पहले की तरह जीती रही, जबकि उसकी जवानी धीरे-धीरे ढलने लगी।

गोकर्ण

एक दिन संयोग से कोई पुण्य पर्व आया और वह अपने बंधुओं के साथ गोकर्ण क्षेत्र गई। दूसरे तीर्थयात्रियों के संग उसने एक तीर्थ के जल में स्नान किया, और फिर परिवार के साथ यों ही घूमती-देखती इधर-उधर फिरने लगी।

एक मंदिर में उसे एक विद्वान ब्राह्मण मिले जो पुराण से शिव की पवित्र और मंगलमय कथा सुना रहे थे। उस समय वे बता रहे थे कि यमलोक में पतिव्रत तोड़ने वाली स्त्रियों का क्या होता है, और यम के दूत वहाँ उन्हें कैसी भयानक यातना देते हैं।

चंचुला ने यह सुना और भय से काँपने लगी।

चंचुला की स्वीकारोक्ति

जब कथा पूरी हुई और लोग बाहर चले गए, तो वह अकेले में उन ब्राह्मण के पास गई।

मैं अपना धर्म नहीं जानती थी, उसने कहा, और मुझसे बड़ा अपराध हुआ है। मेरी बात सुनिए और कृपा करके मुझे इससे उबारिए। अपने अंधेपन में मैंने अपनी सारी जवानी व्यभिचार में बिता दी। अब आपकी बातें सुनकर मैं बहुत डर गई हूँ; मैं काँप रही हूँ, और इस संसार से मेरा मन उठ गया है। मुझे धिक्कार है। ज़रा-से सुख के लिए मैंने बिना समझे ऐसे घोर काम किए जो अपना ही भला मिटा देते हैं।

उसने वह कहा जो उसे आगे दिख रहा था। मैं किस दुर्गति में गिरूँगी, और वहाँ कौन मेरा साथ देगा? मृत्यु के समय यमदूतों को कैसे देखूँगी? जब वे मेरे गले में फंदा डालेंगे, तब धीरज कैसे रखूँगी? जब नरक में मेरे शरीर के टुकड़े किए जाएँगे, तब वह कैसे सहूँगी? अब दिन कैसे कटेगा, और रात को नींद कैसे आएगी?

मैं नष्ट हो गई, वह रो पड़ी; मैं जल रही हूँ; मेरा हृदय फट गया है। शूल से बिंधा और ऊँचे शिखर से गिराया गया व्यक्ति घोर कष्ट पाता है — मेरा दुख उससे करोड़ गुना है। मुझे नहीं लगता कि सौ अश्वमेध यज्ञ या सौ बरस का गंगा-स्नान भी इसे धो सकता है। मैं क्या करूँ? कहाँ जाऊँ? नरक की ओर जाती हुई की इस संसार में कौन रक्षा करेगा?

आप ही मेरे गुरु हैं, उसने कहा। आप ही मेरी माता और मेरे पिता हैं। मैं असहाय हूँ और आपकी शरण में आई हूँ। मुझे बचाइए। और वह उनके चरणों में गिर पड़ी।

ब्राह्मण का उपदेश

बुद्धिमान ब्राह्मण ने दया से उसे उठाया। यह तुम्हारा सौभाग्य है, उन्होंने कहा, कि शिव की कृपा से तुमने यह कथा सुनी और समय रहते चेत गईं। डरो मत। शिव की शरण लो; उनकी कृपा से सारा पाप तुरंत नष्ट हो जाता है।

फिर उन्होंने बताया कि पश्चात्ताप का मूल्य क्या है। शिव की कथा सुनने से ही तुम्हारा मन पछतावे से भरा और निर्मल हुआ है और इंद्रियों के सुखों से हटा है। जिन्होंने गलत किया है उनके लिए पश्चात्ताप ही सबसे बड़ा प्रायश्चित्त है; सज्जनों ने कहा है कि वह हर पाप को शुद्ध करता है, और विधि से बताए प्रायश्चित्त जो कुछ साधना चाहते हैं वह सब उसी से सध जाता है। जो विधिपूर्वक प्रायश्चित्त करके निश्चिंत हो जाता है पर पछताता नहीं, उसकी प्रायः अच्छी गति नहीं होती। जो हृदय से पछताता है, उसकी अवश्य होती है।

शिव पुराण की कथा जैसा मन को कुछ नहीं धोता, वे आगे बोले। जैसे पोंछने से दर्पण साफ़ हो जाता है, वैसे ही इस कथा से मन साफ़ हो जाता है — और साफ़ मन में शिव जगदंबा पार्वती के साथ बसते हैं। इसीलिए स्वयं महादेव ने सब प्राणियों के भले के लिए यह कथा प्रकट की। इससे शिव का ध्यान सिद्ध होता है; ध्यान से परम ज्ञान, और ज्ञान से मोक्ष मिलता है। जो बिना ध्यान के केवल सुनता भर है, वह भी अगले जन्म में वह ध्यान पाकर परम पद तक पहुँचता है।

सुनना बीज है, उन्होंने कहा। सुनना, फिर उसे हृदय में दोहराना और उसी में टिके रहना — इससे मन पूरी तरह शुद्ध हो जाता है। शुद्ध मन से महेश्वर की भक्ति जन्म लेती है, अपने दो पुत्रों ज्ञान और वैराग्य के साथ; और तब महेश्वर की कृपा से मुक्ति मिलती है। इसलिए मन को विषयों से हटाओ और भक्ति से यह कथा सुनो। जो निर्मल मन से शिव के चरणों का चिंतन करता है, वह एक ही जन्म में मुक्त हो जाता है। यह मैं तुमसे सच कहता हूँ।

इतना कहकर ब्राह्मण चुप हो गए, उनका हृदय करुणा से भीग गया, और वे शिव के ध्यान में डूब गए।

पूरे पुराण का श्रवण

चंचुला की आँखों में आनंद के आँसू भर आए। वह फिर उनके चरणों में गिरी और हाथ जोड़कर बोली: मैं कृतार्थ हो गई। फिर वह उठी और भरे गले से एक बात और माँगी। आप धन्य हैं, उसने कहा; आप वह देखते हैं जो सचमुच काम का है, और दूसरों के भले के लिए जीते हैं। मैं नरक के समुद्र में गिर रही हूँ — मुझे निकालिए। जिस कथा ने मुझे यह वैराग्य दिया, अब उसी कथा को पूरा सुनने की मुझे बड़ी चाह है।

उनकी अनुमति से वह वहीं उनकी सेवा में रहने लगी। और वहीं, गोकर्ण के महाक्षेत्र में, उन शुद्ध बुद्धि वाले ब्राह्मण ने उसे पूरा शिव पुराण सुनाया — वह कथा जो भक्ति, ज्ञान और वैराग्य बढ़ाती है और मुक्ति देती है।

गुरु की कृपा से उसका मन जल्दी ही निर्मल हो गया। शिव की कृपा से वह उनके सगुण रूप का चिंतन करने लगी, और फिर बार-बार उनके सच्चिदानंद स्वरूप का।

उसका जीवन पूरी तरह बदल गया। वह रोज़ तीर्थ में स्नान करती। उसने जटा और वल्कल धारण किए, सारे शरीर पर भस्म लगाई और रुद्राक्ष पहने। वह शिव-नाम जपती, कम बोलती, कम खाती, और गुरु के बताए मार्ग से शिव की सेवा करती। शंभु के ध्यान में इसी तरह बहुत समय बीत गया।

शिवलोक

जब उसका समय पूरा हुआ, तो भक्ति, ज्ञान और वैराग्य से भरी चंचुला ने बिना किसी कष्ट के शरीर छोड़ दिया।

उसी क्षण एक दिव्य विमान आ पहुँचा, जिसे त्रिपुर के शत्रु शिव ने भेजा था और जिसके साथ उनके अपने गण थे। वह उस पर चढ़ी, और शिव के पार्षद उसे सीधे उनकी पुरी में ले गए। उसका हर मैल धुल चुका था। उसका रूप दिव्य था, गौर और दीप्त, दिव्य आभूषणों से सजा, और सिर पर अर्धचंद्र का मुकुट।

वहाँ उसने त्रिनेत्र, सनातन महादेव को देखा। ब्रह्मा, विष्णु और दूसरे देवता उनकी सेवा कर रहे थे; गणेश, भृंगी, नंदीश, वीरभद्र और दूसरे गण भक्ति से उनकी उपासना में थे। वे करोड़ों सूर्यों की तरह दमक रहे थे। उनके कंठ में नील चिह्न था; उनके पाँच मुख थे और हर मुख में तीन नेत्र, और सिर पर अर्धचंद्र। वे कपूर जैसे गोरे थे, श्वेत वस्त्र पहने, शरीर श्वेत भस्म से उजला, और उनके बाईं ओर बिजली के पुंज जैसी दीप्त गौरी बैठी थीं।

चंचुला आनंद से भर गई। उसने उन्हें बार-बार प्रणाम किया, और फिर हाथ जोड़कर, विनीत और संतुष्ट, खड़ी रही; आँखों से आनंद के आँसू बह रहे थे और शरीर रोमांचित था।

पार्वती और शिव ने बड़ी करुणा से उसे पास बुलाया और कोमल दृष्टि से देखा। और पार्वती ने प्रेम से चंचुला को अपनी सखी बना लिया। इस तरह वह उस ज्योति और आनंद के सनातन धाम में अडिग रूप से रहने लगी।

“मेरे पति कहाँ हैं?”

शौनक जी पूछते हैं कि इसके बाद चंचुला ने क्या किया, और उसके पति का क्या हुआ।

एक दिन, सूत जी कहते हैं, चंचुला उमा के पास गई, प्रणाम किया और हाथ जोड़कर उनकी स्तुति की: गिरिराज की पुत्री, स्कंद की माता, शंभु की प्रिया — विष्णु, ब्रह्मा और देवता आपकी सेवा करते हैं। आप सगुण भी हैं और निर्गुण भी; आप ही सूक्ष्म, सच्चिदानंद-स्वरूप आदि प्रकृति हैं। आप ही संसार को रचती, पालती और समेटती हैं; आप वह पराशक्ति हैं जिसमें ब्रह्मा, विष्णु और महेश्वर का वास है। फिर वह सिर झुकाए चुप खड़ी रही, आँखें भीगी हुईं।

अपने भक्तों पर स्नेह रखने वाली पार्वती ने कहा: सखी चंचुला, मैं तुम्हारी स्तुति से प्रसन्न हूँ। वर माँगो। ऐसा कुछ नहीं जो मैं तुम्हें न दूँ।

चंचुला ने प्रणाम करके पूछा: मैं नहीं जानती कि मेरे पति बिंदुग इस समय कहाँ हैं, या उनकी क्या गति हुई। कृपा करके कोई ऐसा उपाय कीजिए कि मैं फिर उनसे मिल सकूँ। वे एक गणिका में आसक्त थे और पाप में डूबे थे, और मुझसे पहले ही चल बसे।

पार्वती ने उसे बेटी कहकर प्रेम से उत्तर दिया, पर सच को नरम नहीं किया। तुम्हारा पति बिंदुग बड़ा पापी था और उसका मन दूषित था। मरने के बाद वह नरक में गिरा और अनगिनत बरसों तक वहाँ दुख भोगता रहा। अब बचा हुआ पाप भोगने के लिए वह विंध्य पर्वत पर पिशाच बना है। वह अब भी वहीं है, हवा पीकर जीता और हर तरह का कष्ट सहता हुआ।

चंचुला पति के दुख से दुखी हो उठी। उसने मन को सँभाला, फिर प्रणाम किया और पूछा: महादेवी, मुझ पर कृपा कीजिए और उनका उद्धार कीजिए। उस पापी को किस उपाय से अच्छी गति मिल सकती है? जल्दी बताइए।

यदि तुम्हारा पति शिव पुराण की पुण्य कथा सुने, पार्वती ने कहा, तो वह अपनी सारी दुर्गति पार करके अच्छी गति पाएगा।

चंचुला ने बार-बार प्रणाम किया और विनती की कि उसे यह कथा सुनाने का प्रबंध किया जाए।

तुंबुरु को भेजा जाता है

उसकी बार-बार की विनती से द्रवित होकर पार्वती ने गंधर्वराज तुंबुरु को बुलाया, जो शिव का यश गाते हैं।

तुंबुरु, उन्होंने कहा, तुम शिव से प्रेम करते हो और मेरा मन जानते हो। मेरी इस सखी के साथ शीघ्र विंध्य पर्वत पर जाओ। वहाँ एक भयंकर पिशाच रहता है। उसकी कथा मैं तुम्हें आरंभ से बताती हूँ।

पिछले जन्म में वह बिंदुग नाम का ब्राह्मण था, मेरी सखी चंचुला का पति। वह एक गणिका के पास रहने लगा, स्नान और नित्यकर्म छोड़ दिए, और अपवित्र रहने लगा। क्रोध ने उसकी बुद्धि को ऐसा ढक लिया कि उसे सही-गलत का भेद न रहा। वह अभक्ष्य खाता, सज्जनों से द्वेष करता, दूषित दान लेता, हथियार लेकर हिंसा करता, दीनों को सताता और क्रूरता से दूसरों के घरों में आग लगा देता था। वह नीच संगति में रहा, पत्नी को छोड़ दिया, अपना सारा पुण्य नष्ट कर लिया — और धन के लोभ में अपनी ही पत्नी को व्यभिचार में धकेल दिया। मरते दम तक वह ऐसा ही रहा। वह यम की भयानक पुरी में गया, बहुत-से नरक भोगे, और अब विंध्य पर पिशाच बनकर अपनी करनी का फल पा रहा है।

उसके सामने ध्यान से शिव पुराण का प्रवचन करो, उन्होंने कहा। उसे सुनकर उसका हृदय जल्दी ही सब पापों से शुद्ध हो जाएगा और वह वह प्रेत-दशा छोड़ देगा। जब वह छूट जाए, तो मेरी आज्ञा से उसे विमान पर बिठाकर शिव के पास ले आना।

तुंबुरु प्रसन्न हुए और उन्होंने अपने को भाग्यशाली माना। वे चंचुला के साथ विमान पर चढ़े — जिसे सूत जी यहाँ उस पिशाच की सती-साध्वी पत्नी कहते हैं — और नारद के प्रिय मित्र तेज़ी से विंध्य पर्वत पहुँचे।

विंध्य पर कथा

वहाँ उन्होंने पिशाच को देखा। उसका शरीर विशाल था और जबड़ा बहुत बड़ा; वह कभी हँसता, कभी रोता, और उछलता-कूदता था। देखने में वह बड़ा डरावना था। तुंबुरु ने, जो बहुत बलवान थे, उसे ज़बरदस्ती पकड़कर पाशों से बाँध दिया।

फिर, शिव पुराण सुनाने का निश्चय करके, तुंबुरु ने एक उत्सव-स्थल सजाया और मंडप बनाया। सब लोकों में तेज़ी से यह बात फैल गई कि देवी पार्वती की आज्ञा से तुंबुरु एक पिशाच के उद्धार के लिए शिव पुराण सुनाने विंध्य पर गए हैं। उसे सुनने की चाह में बहुत-से देवता और ऋषि वहाँ दौड़े आए, और पर्वत पर एक अद्भुत, मंगलमय सभा जुट गई।

तुंबुरु ने पिशाच को, बँधा हुआ ही, एक आसन पर बिठाया। उन्होंने अपनी वीणा उठाई और गौरीपति की कथा गाना आरंभ किया। उन्होंने शिव पुराण आदि से अंत तक स्पष्ट सुनाया — माहात्म्य, और फिर पहली संहिता से सातवीं तक।

बिंदुग की मुक्ति

जिन्होंने सुना, वे सब कृतार्थ हो गए। और पिशाच ने, उस परम पवित्र पुराण को सुनकर, अपने सारे पाप धो डाले और अपना पैशाचिक शरीर छोड़ दिया।

तुरंत उसका रूप दिव्य हो गया। वह गौर और दीप्त था, श्वेत वस्त्र और हर आभूषण पहने — त्रिनेत्र, सिर पर चंद्र, ठीक शिव जैसे रूप में। उस दिव्य देह में स्वयं बिंदुग, अपनी पत्नी चंचुला के साथ, पार्वतीपति के चरित्र गाने लगा।

देवता और ऋषि यह देखकर चकित रह गए, और उनके हृदय आनंद से भर गए। महेश्वर की अद्भुत कथा सुनकर वे शिव का यश गाते हुए अपने-अपने लोक लौट गए।

बिंदुग अपनी प्रिय पत्नी के पास विमान पर बैठा, आकाश में दमकता हुआ। महेश्वर के गुण गाता हुआ वह जल्दी ही उसके और तुंबुरु के साथ शिव के धाम पहुँच गया। शिव और पार्वती ने प्रसन्न होकर आदर से उसका स्वागत किया और उसे अपना गण बना लिया, और चंचुला पार्वती की सखी बनी रही। ज्योति और आनंद के उस सनातन धाम में पति-पत्नी परम सुख से साथ रहने लगे।

यह इतिहास, सूत जी अंत में कहते हैं, पाप का नाश करता है, उमा और महेश्वर को आनंद देता है, और उनमें भक्ति बढ़ाता है। जो इसे भक्ति से सुनता है, या एकाग्र मन से पढ़ता है, वह इस संसार में बहुत-से सुख भोगकर अंत में मुक्त हो जाता है।

॥ इति ॥

कथा पूर्ण

अर्पण

जो मन में है, अर्पित करें

विचार

आपके मन में क्या रह गया?

एक पंक्ति, एक स्मृति, एक प्रश्न — इसने आपके मन में जो जगाया, वह साझा कीजिए। भेजते ही यह यहाँ दिखेगा।

यह कथा कहाँ वर्णित है

अध्याय
निश्चित
शिव पुराण
माहात्म्य, अध्याय 3 — चंचुला का पाप से भय और संसार से वैराग्य (शौनक की प्रार्थना: 3.1–4; बाष्कल गाँव: 3.5–10; बिंदुग और चंचुला, उसका लंबा धैर्य और पतन: 3.11–16; भेद खुलना और कलह: 3.17–24; बिंदुग का समझौता: 3.25–31; उसकी मृत्यु और पिशाच-दशा, चंचुला के बाद के वर्ष: 3.32–35; गोकर्ण और पुराण-कथा: 3.36–40; उसकी स्वीकारोक्ति: 3.41–57)
क्रमांकन: गीताप्रेस, गोरखपुर — कल्याण श्रीशिवमहापुराणाङ्क (श्लोकाङ्क सहित हिन्दी अनुवाद)
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अध्याय
निश्चित
शिव पुराण
माहात्म्य, अध्याय 4 — ब्राह्मण का उसे पूरा शिव पुराण सुनाना; चंचुला का पार्वती की सखी होना (ढाढ़स और पश्चात्ताप का उपदेश: 4.1–8; दर्पण, ध्यान और मोक्ष: 4.9–14; श्रवण, मनन और भक्ति: 4.15–22; उसकी प्रार्थना: 4.23–29; गोकर्ण में पुराण-श्रवण: 4.30–32; उसकी साधना: 4.33–37; देह-त्याग और विमान: 4.38–41; शिव-दर्शन: 4.42–45; पार्वती का उसे सखी बनाना: 4.46–50)
क्रमांकन: गीताप्रेस, गोरखपुर — कल्याण श्रीशिवमहापुराणाङ्क (श्लोकाङ्क सहित हिन्दी अनुवाद)
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अध्याय
निश्चित
शिव पुराण
माहात्म्य, अध्याय 5 — तुंबुरु द्वारा बिंदुग का पिशाच-योनि से उद्धार (चंचुला की उमा-स्तुति और वर: 5.1–10; उसका प्रश्न और पार्वती का उत्तर: 5.11–16; उसकी विनती और उपाय: 5.17–24; तुंबुरु का बुलाया जाना, बिंदुग का वृत्तांत: 5.25–35; पार्वती का आदेश: 5.36–38; यात्रा और पिशाच का बाँधा जाना: 5.39–42; विंध्य पर सभा: 5.43–46; कथा: 5.47–48; बिंदुग का रूपांतर: 5.49–54; शिवधाम: 5.55–58; फलश्रुति: 5.59–60)
क्रमांकन: गीताप्रेस, गोरखपुर — कल्याण श्रीशिवमहापुराणाङ्क (श्लोकाङ्क सहित हिन्दी अनुवाद)
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3 में से 3 स्रोत अध्याय या श्लोक तक निश्चित। यह पृष्ठ अभी किसी संपादक द्वारा समीक्षित नहीं है। हम कैसे जाँचते हैं →

कथा के अलग-अलग रूप

  • माहात्म्य शिव पुराण की महिमा बताने वाली भूमिका है जो पुराण से पहले छापी जाती है; इसके अपने अध्याय-समापन इसे स्कंद पुराण के अंतर्गत बताते हैं।
  • पुराण इस दंपती के आचरण के बारे में बेलाग है, और यमलोक का वह दंड, जिससे चंचुला डर जाती है, खुले शब्दों में कहता है। यह पुनर्कथन घटनाओं और उनके क्रम को रखता है, पर वह ब्योरा नहीं दोहराता।
  • पाठ दोष अकेली चंचुला पर नहीं डालता। वह कहता है कि धर्म खोने के डर से वह लंबे समय तक टिकी रही, और तुंबुरु को बिंदुग का जीवन सुनाते हुए पार्वती साफ़ कहती हैं कि उसी ने लोभ में अपनी पत्नी को व्यभिचार में धकेला।
  • पिछले अध्याय का देवराज बीमारी में केवल पुराण सुन लेने से तर जाता है। चंचुला की कथा वह जोड़ती है जो वहाँ नहीं है: पश्चात्ताप, जिसे ब्राह्मण सबसे बड़ा प्रायश्चित्त कहते हैं, और उसके बाद गुरु, पूरा श्रवण और लंबी साधना।