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अन्धकवधअंधकार से जन्मा, त्रिशूल पर मुक्त हुआ

अंधक — अंधा पुत्र

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शिव और पार्वती के एक क्षण के खेल से एक अंधा बालक जन्मता है, जो बड़ा होकर असुरों का राजा बनता है — और अंत में शिव का अपना गण बन जाता है। इसी बीच असुरों के गुरु को जीवित निगल लिया जाता है।

कथा कथा — नीचे दिए ग्रंथों के आधार पर, हमारे शब्दों में

ढँकी आँखों का खेल

एक बार मंदराचल पर्वत पर शिव पूर्व की ओर मुख करके बैठे थे, और पार्वती ने खेल में पीछे से आकर अपने हाथों से उनकी आँखें ढँक दीं। उसी क्षण सारे संसार में अंधकार छा गया — क्योंकि शिव के नेत्र ही सूर्य और चंद्रमा हैं। पर उनके मस्तक पर तीसरा नेत्र अब भी जल रहा था, और उसकी ऊष्मा से पार्वती के हाथों में पसीना आ गया।

पसीने की उन बूँदों से, उस अंधकार में, एक बालक जन्मा: श्याम, बिखरे बालों वाला, भयंकर मुख वाला, और अंधा। प्रकट होते ही वह हँसने, गाने, रोने और चीख़ने लगा। जब पार्वती ने हाथ हटाए और प्रकाश लौटा, तो बालक और भी भयानक दिखा। “यह किसका है?” उन्होंने पूछा। शिव मुस्कुराए: “हमारा। तुमने मेरी आँखें ढँककर इसे रचा है।” अंधकार में अंधा जन्मा, इसलिए उसका नाम अंधक पड़ा।

दान में दिया गया

उस समय असुर हिरण्याक्ष पुत्र के लिए शिव से प्रार्थना कर रहा था। शिव ने उसे अंधक दे दिया। हिरण्याक्ष ने अंधे बालक को अपना पुत्र मानकर पाला और उत्तराधिकारी बनाया। बाद में हिरण्याक्ष पृथ्वी को पाताल ले गया और वराह रूप विष्णु के हाथों मारा गया; उसका भाई हिरण्यकशिपु नृसिंह के हाथों मारा गया। अंधक असुरों के बीच बड़ा हुआ, जहाँ चचेरे भाई उसका उपहास करते थे कि अंधे को सिंहासन मिल गया।

तप और अहंकार

आहत होकर अंधक वन में गया और ऐसा भयानक तप किया कि अपना ही मांस अग्नि में होमने लगा। ब्रह्मा प्रकट हुए और उसे वर दिए — दृष्टि, बल, और लगभग अजेयता। अंधक लौटा, तीनों लोक जीते और भोग में डूब गया। फिर उसके मंत्रियों ने उसे मंदराचल पर रहने वाली एक ऐसी स्त्री के बारे में बताया जो सृष्टि में सबसे सुंदर थी। वह नहीं जानता था — या जानना नहीं चाहता था — कि वे पार्वती हैं, उसकी अपनी माता।

गुफा का रक्षक

शिव महापाशुपत व्रत करने वन में गए थे, और पार्वती को मंदराचल की एक गुफा में छोड़ गए थे, जिसकी रक्षा भक्त गण वीरक करता था। अंधक अपनी सेनाओं के साथ आया। पाँच सौ पाँच दिन और रात वीरक अकेला असुर सेनाओं के सामने गुफा का द्वार थामे रहा। जब अंततः वीरक गिरा, तो पार्वती ने देवियों का आह्वान किया, और वे सैकड़ों की संख्या में उनके साथ लड़ने आईं।

रक्त जो और असुर बनाता है

फिर शिव लौटे, और असली युद्ध शुरू हुआ। पर अंधक के रक्त की जो भी बूँद धरती पर गिरती, वह एक नया अंधक बन जाती — हज़ारों अंधक। शिव के कहने पर एक उग्र देवी-रूप ने — शिव पुराण कहता है कि यह रूप स्वयं विष्णु ने धरा — रक्त को गिरने से पहले ही पी लिया। अंत में शिव ने त्रिशूल से अंधक का हृदय बेध दिया और उसे त्रिशूल पर टाँगकर आकाश में ऊँचा उठा दिया, जैसे खंभे पर सूखा ठूँठ।

निगले गए गुरु

उधर रणभूमि में असुर बार-बार उठ खड़े होते। उनके गुरु शुक्राचार्य मृतसंजीवनी विद्या जानते थे — मरे हुओं को जिलाने का रहस्य — और हर गिरा हुआ असुर फिर खड़ा हो जाता। नंदी ने शिव को यह बताया, और शिव ने उन्हें शुक्राचार्य को लाने भेजा। नंदी ने ऋषि को ऐसे पकड़ा जैसे सिंह हिरण को पकड़ता है, और शिव के पास ले आए। और शिव ने उन्हें सहज ही निगल लिया।

शिव के शरीर के भीतर शुक्राचार्य युगों तक भटकते रहे। उन्होंने वहाँ सारे लोक देखे, और अंधक के साथ युद्ध भी, पर बाहर निकलने का कोई मार्ग न मिला। उन्होंने एक मंत्र से शिव की प्रार्थना की — शिव पुराण उसका भावार्थ देता है — और अंततः शिव ने उन्हें उस मार्ग से मुक्त किया जिससे वीर्य (शुक्र) शरीर से निकलता है। इसी से ऋषि शुक्र कहलाए। शिव और पार्वती ने उन्हें पुत्र रूप में स्वीकार किया और शांति से विदा किया।

अंधे को दृष्टि मिली

अनगिनत वर्षों तक त्रिशूल पर लटके अंधक को उसकी अग्नि ने शुद्ध कर दिया। उसका शरीर सूख गया, पर साथ ही उसका अहंकार भी सूख गया। त्रिशूल पर से ही वह नाम पर नाम लेकर शिव की स्तुति करने लगा। द्रवित होकर शिव ने उसे नीचे उतारा, स्वस्थ किया, और अपना गण बना लिया — अपने सेवकों में एक अधिपति। अंधकार का बालक घर लौट आया था।

॥ इति ॥

कथा पूर्ण

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यह कथा कहाँ वर्णित है

अध्याय
निश्चित
शिव पुराण
रुद्र संहिता, युद्ध खंड, अध्याय 42–49 (पार्वती के पसीने से जन्म: 42.13–24; चचेरे भाइयों का उपहास, अग्नि में मांस की आहुति, ब्रह्मा से दृष्टि और वर: 44.1–12; पार्वती की कामना: 44; गुफा पर वीरक और लड़ती देवियाँ: 45; रक्त, देवी और त्रिशूल: 46.37; शुक्र को निगलना: 47; शुक्र की मुक्ति और पुत्र रूप में स्वीकार: 48; अंधक की स्तुति और गणपद: 49)
क्रमांकन: गीताप्रेस, गोरखपुर — कल्याण श्रीशिवमहापुराणाङ्क (श्लोकाङ्क सहित हिन्दी अनुवाद)

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कथा के अलग-अलग रूप

  • मत्स्य, कूर्म और लिंग पुराण भी अंधक की कथा कहते हैं; कई में अंधक भृंगी बन जाता है — वह कंकाल-सा भक्त जो केवल शिव की परिक्रमा करता है, पार्वती की नहीं।
  • अनेक कथाओं में अंधक का रक्त पीने वाली देवियाँ मातृकाएँ हैं; देवी माहात्म्य रक्तबीज असुर के साथ इसी जैसी कथा कहता है।
  • शिव द्वारा शुक्र को निगलने की कथा कुछ परंपराओं में उनके नाम और “शिव-पुत्र” उपाधि की व्याख्या करती है।