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ज्योतिर्लिङ्ग12 / 12 · महाराष्ट्र

घृष्णेश्वर ज्योतिर्लिंग

Ghuśmeśvara

वेरूळ, एलोरा के पास, महाराष्ट्र

“ghuśmeśaṃ ca śivālaye” — द्वादश ज्योतिर्लिंग स्तोत्र

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कथा और स्थान

घुश्मेश्वर, जिन्हें आज घृष्णेश्वर कहा जाता है, महाराष्ट्र के वेरुल गाँव में हैं। मंदिर एलोरा की गुफाओं से कुछ ही मिनट की पैदल दूरी पर और छत्रपति संभाजीनगर (औरंगाबाद) शहर से थोड़ी दूर है। बारह ज्योतिर्लिंगों की पारंपरिक सूची में यह अंतिम नाम है।

शिव पुराण में सुधर्मा नाम के ब्राह्मण की कथा है, जो अपनी पत्नी सुदेहा के साथ देवगिरि पर्वत के पास रहते थे। उनकी कोई संतान नहीं थी, तो सुदेहा ने पति को मनाकर अपनी छोटी बहन घुश्मा से भी उनका विवाह करा दिया। घुश्मा प्रतिदिन एक सौ एक पार्थिव लिंग बनाती, उनकी पूजा करती और उन्हें पास के सरोवर में विसर्जित कर देती। समय आने पर उसे पुत्र हुआ। लड़का बड़ा हुआ, उसका विवाह हुआ, और सुदेहा की जलन भी बढ़ती गई। एक रात उसने लड़के को मार डाला और उसका शरीर उसी सरोवर में फेंक दिया। सुबह घर में कोहराम मच गया, पर घुश्मा ने अपनी पूजा नहीं छोड़ी। जब वह लिंगों का विसर्जन करने सरोवर पर गई, तो देखा कि उसका पुत्र जीता-जागता उसकी ओर चला आ रहा है। शिव प्रकट हुए और सुदेहा को दंड देने को तैयार थे; घुश्मा ने उलटे अपनी बहन के लिए क्षमा माँगी। शिव उसकी पूजा से भी अधिक इस बात से प्रसन्न हुए और वर माँगने को कहा। घुश्मा ने माँगा कि वे सबकी रक्षा के लिए वहीं रहें। शिव ने उसी का नाम धारण किया और घुश्मेश के रूप में वहीं ठहर गए।

श्रद्धालु इस कथा के अंत को ही याद रखते हैं: बारह कथाओं में यह क्षमा की कथा है, और इस तीर्थ का नाम किसी देवता या राजा पर नहीं, एक भक्त स्त्री पर है। लाल पत्थर का, सुंदर नक्काशी वाला वर्तमान मंदिर अठारहवीं सदी में इंदौर की अहिल्याबाई होल्कर ने फिर से बनवाया, जिन्होंने काशी विश्वनाथ मंदिर भी बनवाया था; उससे पहले के जीर्णोद्धार का श्रेय छत्रपति शिवाजी के दादा मालोजी भोसले को दिया जाता है। ज्योतिर्लिंग मंदिरों में यह आकार में छोटे मंदिरों में से है।

यात्री के लिए

समय, मार्ग और व्यवस्था बदलती रहती है — जाने से पहले मंदिर की आधिकारिक सूचना देख लें।

  • निकटतम शहर, रेलवे स्टेशन और हवाई अड्डा छत्रपति संभाजीनगर (औरंगाबाद) है; वहाँ से वेरुल सड़क से पहुँचा जाता है।
  • गाँव से सटी एलोरा की गुफाएँ हैं, जिनमें चट्टान काटकर बना कैलास मंदिर भी है, और रास्ते में दौलताबाद (देवगिरि) का किला पड़ता है।
  • मंदिर साल भर खुला रहता है। महाशिवरात्रि और सावन के सोमवारों को सबसे अधिक भीड़ होती है।
  • इस मंदिर की पुरानी परंपरा के अनुसार पुरुष गर्भगृह में जाने से पहले कमर से ऊपर के वस्त्र उतार देते हैं।

पूरी कथा

स्रोत

अध्याय
निश्चित
शिव पुराण
कोटिरुद्र संहिता, अध्याय 32–33
क्रमांकन: गीताप्रेस, गोरखपुर — कल्याण श्रीशिवमहापुराणाङ्क (श्लोकाङ्क सहित हिन्दी अनुवाद)
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