लिङ्गाष्टकम्
लिङ्गाष्टकम् शिवलिंग की स्तुति में आठ संस्कृत श्लोकों का स्तोत्र है, जिसके अंत में पाठ के फल का एक श्लोक आता है। हर श्लोक एक ही पंक्ति पर पूरा होता है — “तत् प्रणमामि सदाशिवलिङ्गम्”, अर्थात् “उस सदाशिव-लिंग को मैं प्रणाम करता हूँ।”
हर श्लोक लिंग की कुछ विशेषताएँ बताता है: ब्रह्मा, विष्णु और देवता उसकी पूजा करते हैं; वह चंदन, फूलों और रत्नों से सजा है; सारी सृष्टि का कारण वही है। स्तोत्र में प्रसिद्ध कथाओं का भी स्मरण है — कामदेव का दहन, रावण के अभिमान का टूटना और दक्ष के यज्ञ का विध्वंस।
इसके रचयिता निश्चित रूप से ज्ञात नहीं हैं। इसे बहुत बार आदि शंकराचार्य की रचना कहा जाता है और कई छपी पुस्तकों में भी यही लिखा मिलता है, पर यह बात परंपरा पर टिकी है; हमें इसका पक्का प्रमाण नहीं मिला। इसलिए हम इसे पारंपरिक स्तोत्र के रूप में दे रहे हैं।
पाठ छोटा, सरल और लयबद्ध है, इसी कारण यह सबसे अधिक गाए जाने वाले शिव-स्तोत्रों में है। छपे पाठों में कुछ शब्दों का अंतर मिलता है (नीचे टिप्पणी में); यहाँ प्रचलित पाठ दिया गया है।
पूरा पाठ
- 1ब्रह्ममुरारिसुरार्चितलिङ्गंनिर्मलभासितशोभितलिङ्गम् ।जन्मजदुःखविनाशकलिङ्गंतत् प्रणमामि सदाशिवलिङ्गम् ॥ १ ॥brahmamurārisurārcitaliṅgaṃnirmalabhāsitaśobhitaliṅgam |janmajaduḥkhavināśakaliṅgaṃtat praṇamāmi sadāśivaliṅgam || 1 ||
जिस लिंग की ब्रह्मा, विष्णु और देवता पूजा करते हैं, जो निर्मल प्रकाश से शोभित है और जन्म से जुड़े दुखों का नाश करता है, उस सदाशिव-लिंग को मैं प्रणाम करता हूँ।
- 2देवमुनिप्रवरार्चितलिङ्गंकामदहं करुणाकरलिङ्गम् ।रावणदर्पविनाशनलिङ्गंतत् प्रणमामि सदाशिवलिङ्गम् ॥ २ ॥devamunipravarārcitaliṅgaṃkāmadahaṃ karuṇākaraliṅgam |rāvaṇadarpavināśanaliṅgaṃtat praṇamāmi sadāśivaliṅgam || 2 ||
जिस लिंग की देवता और श्रेष्ठ मुनि पूजा करते हैं, जो कामदेव को भस्म करने वाला होकर भी करुणा की खान है और जिसने रावण का अभिमान नष्ट किया, उस सदाशिव-लिंग को मैं प्रणाम करता हूँ।
- 3सर्वसुगन्धिसुलेपितलिङ्गंबुद्धिविवर्धनकारणलिङ्गम् ।सिद्धसुरासुरवन्दितलिङ्गंतत् प्रणमामि सदाशिवलिङ्गम् ॥ ३ ॥sarvasugandhisulepitaliṅgaṃbuddhivivardhanakāraṇaliṅgam |siddhasurāsuravanditaliṅgaṃtat praṇamāmi sadāśivaliṅgam || 3 ||
जो लिंग सब प्रकार के सुगंधित द्रव्यों से लेपित है, जो बुद्धि के बढ़ने का कारण है और जिसकी सिद्ध, देवता और असुर सभी वंदना करते हैं, उस सदाशिव-लिंग को मैं प्रणाम करता हूँ।
- 4कनकमहामणिभूषितलिङ्गंफणिपतिवेष्टितशोभितलिङ्गम् ।दक्षसुयज्ञविनाशनलिङ्गंतत् प्रणमामि सदाशिवलिङ्गम् ॥ ४ ॥kanakamahāmaṇibhūṣitaliṅgaṃphaṇipativeṣṭitaśobhitaliṅgam |dakṣasuyajñavināśanaliṅgaṃtat praṇamāmi sadāśivaliṅgam || 4 ||
जो लिंग सोने और महामणियों से सजा है, जिस पर लिपटे नागराज उसकी शोभा बढ़ाते हैं और जिसने दक्ष के यज्ञ का विध्वंस किया, उस सदाशिव-लिंग को मैं प्रणाम करता हूँ।
- 5कुङ्कुमचन्दनलेपितलिङ्गंपङ्कजहारसुशोभितलिङ्गम् ।सञ्चितपापविनाशनलिङ्गंतत् प्रणमामि सदाशिवलिङ्गम् ॥ ५ ॥kuṅkumacandanalepitaliṅgaṃpaṅkajahārasuśobhitaliṅgam |sañcitapāpavināśanaliṅgaṃtat praṇamāmi sadāśivaliṅgam || 5 ||
जिस लिंग पर कुंकुम और चंदन का लेप है, जो कमल की मालाओं से सुशोभित है और जो संचित पापों का नाश करता है, उस सदाशिव-लिंग को मैं प्रणाम करता हूँ।
- 6देवगणार्चितसेवितलिङ्गंभावैर्भक्तिभिरेव च लिङ्गम् ।दिनकरकोटिप्रभाकरलिङ्गंतत् प्रणमामि सदाशिवलिङ्गम् ॥ ६ ॥devagaṇārcitasevitaliṅgaṃbhāvairbhaktibhireva ca liṅgam |dinakarakoṭiprabhākaraliṅgaṃtat praṇamāmi sadāśivaliṅgam || 6 ||
जिस लिंग की देवगण भाव और भक्ति से पूजा और सेवा करते हैं और जिसका प्रकाश करोड़ों सूर्यों के समान है, उस सदाशिव-लिंग को मैं प्रणाम करता हूँ।
- 7अष्टदलोपरिवेष्टितलिङ्गंसर्वसमुद्भवकारणलिङ्गम् ।अष्टदरिद्रविनाशनलिङ्गंतत् प्रणमामि सदाशिवलिङ्गम् ॥ ७ ॥aṣṭadalopariveṣṭitaliṅgaṃsarvasamudbhavakāraṇaliṅgam |aṣṭadaridravināśanaliṅgaṃtat praṇamāmi sadāśivaliṅgam || 7 ||
जो लिंग अष्टदल कमल पर विराजमान है, जो समस्त सृष्टि की उत्पत्ति का कारण है और जो आठ प्रकार की दरिद्रता का नाश करता है, उस सदाशिव-लिंग को मैं प्रणाम करता हूँ।
- 8सुरगुरुसुरवरपूजितलिङ्गंसुरवनपुष्पसदार्चितलिङ्गम् ।परात्परं परमात्मकलिङ्गंतत् प्रणमामि सदाशिवलिङ्गम् ॥ ८ ॥suragurusuravarapūjitaliṅgaṃsuravanapuṣpasadārcitaliṅgam |parātparaṃ paramātmakaliṅgaṃtat praṇamāmi sadāśivaliṅgam || 8 ||
जिस लिंग की देवगुरु बृहस्पति और श्रेष्ठ देवता पूजा करते हैं, जिसकी देवताओं के उपवन के फूलों से सदा अर्चना होती है, जो परे से भी परे और परमात्मस्वरूप है, उस सदाशिव-लिंग को मैं प्रणाम करता हूँ।
- फलश्रुतिलिङ्गाष्टकमिदं पुण्यं यः पठेत् शिवसन्निधौ ।शिवलोकमवाप्नोति शिवेन सह मोदते ॥liṅgāṣṭakamidaṃ puṇyaṃ yaḥ paṭhet śivasannidhau |śivalokamavāpnoti śivena saha modate ||
अंतिम श्लोक कहता है कि जो इस पवित्र लिङ्गाष्टक का पाठ शिव के सान्निध्य में करता है, वह शिवलोक को प्राप्त होता है और शिव के साथ आनंद पाता है।
पाठ कैसे और कब
यह परंपरा है, शास्त्र का विधान नहीं।
- परंपरा से इसका पाठ घर या मंदिर में शिवलिंग के सामने, जल, बेलपत्र और फूल चढ़ाते समय या उसके बाद किया जाता है।
- बहुत-से भक्त इसे सोमवार, प्रदोष, सावन के महीने और महाशिवरात्रि पर गाते हैं।
- इसे प्रायः ऊँचे स्वर में, अक्सर मिलकर गाया जाता है; हर श्लोक की अंतिम पंक्ति टेक की तरह दोहराई जाती है।
- फलश्रुति में “शिव के सान्निध्य में” पाठ की बात कही गई है, इसीलिए इसे प्रायः शिवलिंग के सामने गाया जाता है।
श्लोक-दर-श्लोक व्याख्या
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