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शिवपार्वतीविवाहपर्वतराज की पुत्री ने तपस्वी को पाया

पार्वती का तप और शिव-विवाह

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सौंदर्य शिव को नहीं जीत सका, इसलिए पार्वती ऐसे कठोर तप में लीन होती हैं कि देवता भी भयभीत हो जाते हैं। तब एक युवा अजनबी उनकी परीक्षा लेने आता है।

कथा कथा — नीचे दिए ग्रंथों के आधार पर, हमारे शब्दों में

वन की ओर

कामदेव के भस्म होने के बाद पार्वती पिता के महल लौट आईं, पर उन्हें चैन नहीं था। उन्होंने माता-पिता से कहा कि वे तप से शिव को पाएँगी। माता मेना ने विनती की: “उ मा — ऐसा मत करो!” — और कवि कहते हैं, इसी से उनका नाम उमा पड़ा।

पर पार्वती चली गईं। उन्होंने रेशम और आभूषण त्याग कर वल्कल वस्त्र धारण किए। तपस्वियों की तरह जटाएँ बढ़ने दीं। हिमालय के एक शिखर पर उन्होंने ऐसा तप आरंभ किया, जो हर ऋतु के साथ कठिन होता गया।

कठोर तप

गर्मी में वे चार अग्नियों के बीच बैठतीं, और ऊपर धधकता सूर्य पाँचवीं अग्नि होता। वर्षा में वे बरसते पानी में नंगी चट्टान पर बैठी रहतीं। शीत में रात भर बर्फ़ीले जल में खड़ी रहतीं। पहले वे केवल फल खाती थीं, फिर केवल गिरे हुए पत्ते — और फिर पत्ते भी नहीं। इसीलिए वे अपर्णा कहलाईं — “जो पत्ता भी नहीं खातीं।”

उनके तप का तेज लोकों में फैल गया। उनके आश्रम में वन्य पशुओं का भय मिट गया; सिंह और हिरण साथ बैठते। देवता भी इसका ताप अनुभव करने लगे।

युवा अजनबी

एक दिन एक युवा ब्रह्मचारी उनके आश्रम में आया — हाथ में दंड, मृगचर्म धारण किए, विद्या के तेज से दमकता। पार्वती ने आदर से उसका स्वागत किया। वह बैठा और स्नेह से पूछा: इतनी कम आयु की, इतनी सुंदर कन्या ऐसे कष्ट में स्वयं को क्यों गला रही है? उसे ऐसा क्या चाहिए?

पार्वती की सखी विजया ने उत्तर दिया: ये शिव को पति रूप में चाहती हैं।

युवक हँस पड़ा। शिव? उसने कहा। वह श्मशान में भटकने वाला? जो मुर्दों की राख मलता है, गले में साँप और तन पर हाथी की खाल पहनता है? जो बूढ़े बैल पर चढ़ता है? जिसके कुल का किसी को पता नहीं? क्या तुम सचमुच अपना वह हाथ, जिस पर विवाह का कंगन बँधना चाहिए, साँपों से लिपटे हाथ में दोगी?

पार्वती का क्रोध

पार्वती के होंठ क्रोध से काँपने लगे। तुम उन्हें नहीं जानते, वे बोलीं। महान को छोटी बुद्धि नहीं समझ सकती। उनके पास कुछ नहीं है — और वे ही सारे ऐश्वर्य के स्रोत हैं। वे श्मशान में रहते हैं — और तीनों लोकों के स्वामी हैं। वे जैसे भी हों, मेरा मन उन्हीं में लगा है, और मैं एक शब्द और नहीं सुनूँगी। वे जाने को मुड़ीं।

ब्रह्मचारी ने उनका हाथ थाम लिया — और अब वह ब्रह्मचारी नहीं था। सामने शिव मुस्कुराते खड़े थे। बोले: आज से मैं तुम्हारा दास हूँ, तुम्हारे तप से ख़रीदा हुआ।

विवाह-प्रस्ताव

शिव ने सप्तर्षियों को अरुंधती के साथ हिमवान के दरबार भेजा, ताकि विधिपूर्वक पार्वती का हाथ माँगा जाए। हिमवान और मेना ने आनंद से स्वीकार किया, और पूरा पर्वत-राज्य विवाह की तैयारी में जुट गया।

सबसे अनोखी बारात

जब बारात आई, तो मेना अपने दामाद को देखने महल की छत पर गईं। पहले वैभव से भरे देवता आए, और हर बार उन्होंने पूछा: क्या यही हैं? उत्तर मिला, नहीं। फिर शिव के अपने गण आए — हर आकार के भूत, प्रेत और पिशाच, किसी का सिर नहीं, किसी के कई सिर — और उनके बीच बैल पर सवार स्वयं शिव, भस्म से ढके, सर्पों और मुंडमाला के साथ। मेना मूर्छित हो गईं।

होश आने पर वे रोने लगीं और ऐसे वर को पुत्री देने से मना कर दिया। तब स्वयं विष्णु ने उन्हें समझाया कि शिव वास्तव में कौन हैं, और अंत में मेना बोलीं: यदि वे सुंदर रूप धारण करें, तो मैं कन्या दूँगी। नारद यह विनती लेकर शिव के पास गए — और शिव मुस्कुराकर सुंदरेश्वर बन गए: करोड़ों सूर्यों-से दीप्तिमान, रत्नों और रेशम से सजे, स्वयं कामदेव से भी सुंदर।

विवाह

इस प्रकार शिव और पार्वती का विवाह हुआ। हिमवान ने कन्यादान किया, ब्रह्मा ने विधि संपन्न कराई, और सारा ब्रह्मांड साक्षी बना। इसी मिलन से वह पुत्र जन्म लेगा जो तारकासुर का अंत करेगा — और महान तपस्वी शिव महान गृहस्थ भी बन गए।

॥ इति ॥

कथा पूर्ण

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यह कथा कहाँ वर्णित है

अध्याय
निश्चित
कालिदास का कुमारसंभव
सर्ग 1 (उमा नाम), सर्ग 5 (पार्वती का तप और ब्रह्मचारी), सर्ग 6–7 (प्रस्ताव और विवाह)
अध्याय
निश्चित
शिव पुराण
रुद्र संहिता, पार्वती खंड, अध्याय 22–48 (तप और अपर्णा नाम: 22.48–49; सप्तर्षियों की परीक्षा: 25; जटिल ब्रह्मचारी: 26–28; मेना का हठ: 43–44; शिव का सुंदर रूप: 45; कन्यादान: 48)
क्रमांकन: गीताप्रेस, गोरखपुर — कल्याण श्रीशिवमहापुराणाङ्क (श्लोकाङ्क सहित हिन्दी अनुवाद)

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कथा के अलग-अलग रूप

  • शिव पुराण में मेना को विष्णु समझाते हैं और नारद उनकी विनती शिव तक ले जाते हैं (पार्वती खंड 44–45)। अनेक लोकप्रिय कथाओं में यह भूमिका स्वयं पार्वती की है।
  • “उ मा” (“ऐसा मत करो”) से “उमा” नाम की व्याख्या कालिदास ने कुमारसंभव में दी है।
  • शिव पुराण में परीक्षा कुछ सप्तर्षि लेते हैं और कुछ वेश बदलकर शिव स्वयं; कालिदास में केवल शिव ही युवा ब्रह्मचारी बनकर आते हैं।
  • मदुरै में यही विवाह सुंदरेश्वर और मीनाक्षी के विवाह के रूप में मनाया जाता है, जिसमें विष्णु (अळगर) कन्या के भाई हैं।