रावण ने कैलाश उठाया
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विजय के मद में रावण शिव के पर्वत को रास्ते से उठा फेंकना चाहता है। शिव केवल एक अँगूठे से दबाते हैं — और दशानन की चीख़ लोकों में गूँज उठती है।
विजेता
रावण बनने से पहले, ऋषि विश्रवा के दस सिरों वाले पुत्र को दशग्रीव कहा जाता था। घोर तप से उसने ब्रह्मा से ऐसे वर पाए थे जिनसे वह लगभग अजेय हो गया था। उसने अपने सौतेले भाई, धन के स्वामी कुबेर को लंका से निकाल दिया, फिर युद्ध में हराकर उनका उड़ने वाला विमान पुष्पक छीन लिया।
विजय के गर्व में हिमालय के ऊपर से घर लौटते हुए दशग्रीव ने पाया कि पुष्पक अचानक आगे नहीं बढ़ रहा। वह आकाश में ऐसे रुक गया मानो किसी अदृश्य दीवार से टकरा गया हो।
नंदी की चेतावनी
शिव के गण नंदी प्रकट हुए और बोले: यह वह पर्वत है जहाँ शिव और पार्वती विहार कर रहे हैं। इसके ऊपर से कोई नहीं जा सकता। लौट जाओ।
दशग्रीव ने नंदी की ओर देखा — इस कथा में जिनका मुख वानर जैसा था — और उनका उपहास किया। नंदी ने श्राप से उत्तर दिया: एक दिन मेरे जैसे मुख वाले प्राणी — वानर — तुम्हारा और तुम्हारे पूरे कुल का नाश करेंगे। (और रामायण संकेत देती है कि इसीलिए एक दिन राम की वानर-सेना लंका पहुँची।)
पर्वत उठाना
दशग्रीव को यह सुनने की आदत नहीं थी कि वह कहाँ जा सकता है, कहाँ नहीं। यदि पर्वत रास्ते में है, तो वह उसे हटा देगा। वह विमान से उतरा, अपनी बीसों भुजाएँ कैलाश के नीचे डालीं और उठाने लगा।
पूरा पर्वत काँप उठा। चट्टानें ढलानों से लुढ़कने लगीं। शिव के गण भय से बिखर गए, और चौंककर पार्वती शिव से लिपट गईं।
एक अँगूठा
शिव उठे तक नहीं। मुस्कुराते हुए, मानो खेल में, उन्होंने केवल अपने पैर के अँगूठे से पर्वत को नीचे दबा दिया।
कैलाश अपनी जगह बैठ गया — और दशग्रीव की बीसों भुजाएँ उसके नीचे दब गईं, पूरे पर्वत के भार से पिसती हुई। उसने पीड़ा से ऐसी भयानक चीख़ मारी कि तीनों लोक काँप उठे। जिसने भी सुनी, भयभीत हो गया।
हज़ार वर्षों की स्तुति
उसके मंत्रियों ने कहा कि निकलने का एक ही उपाय है: शिव की स्तुति। तब पर्वत के नीचे दबे दशग्रीव ने शिव की महिमा गानी शुरू की — और कहते हैं, वह हज़ार वर्षों तक गाता रहा।
अंत में शिव ने अँगूठा उठाया और उसे मुक्त किया। इतने अहंकार से निकली भक्ति पर वे प्रसन्न थे। शिव बोले, “तुमने अपनी चीख़ से लोकों को रुला दिया, इसलिए तुम रावण कहलाओगे — जिसने लोकों को चीत्कार करा दिया।” और उन्होंने रावण को एक उपहार दिया: दिव्य खड्ग चंद्रहास — चंद्रमा की हँसी।
अहंकार और भक्ति
रावण जीवन भर शिव का भक्त रहा। फिर भी वही अहंकार, जिसने उससे कैलाश उठवाया, एक दिन उससे सीता का हरण करवाएगा — और उसकी मृत्यु का कारण बनेगा। यह कथा दोनों सत्य एक साथ रखती है: शिव सबसे अहंकारी भक्त को भी नहीं ठुकराते, पर जिसे वे स्थिर रखें, उसे कोई बल हिला नहीं सकता।
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कथा के अलग-अलग रूप
- परंपरा इस प्रसंग को शिव तांडव स्तोत्रम् से जोड़ती है — कहती है कि रावण ने पर्वत के नीचे यही स्तोत्र गाया। स्वयं रामायण इतना कहती है कि उसने स्तोत्रों से शिव की स्तुति की, पर तांडव स्तोत्र का नाम नहीं लेती।
- यह दृश्य — रावणानुग्रह, “रावण पर किया गया अनुग्रह” — एलोरा (कैलाश मंदिर) और दक्षिण भारत के अनेक मंदिरों में उकेरा गया है।
- तेवारम् के तमिल स्तोत्र प्रायः किसी पद का अंत यह याद करते हुए करते हैं कि शिव ने अँगूठे से रावण को दबाया और फिर उस पर कृपा की।