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कामदहनजब काम का सामना तीसरे नेत्र से हुआ

कामदेव का दहन

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देवताओं को शिव का विवाह चाहिए, इसलिए वे प्रेम के देवता कामदेव को उनकी समाधि भंग करने भेजते हैं। और तीसरा नेत्र खुल जाता है।

कथा कथा — नीचे दिए ग्रंथों के आधार पर, हमारे शब्दों में

वह असुर जिसे केवल शिव-पुत्र मार सकता था

सती के देह-त्याग के बाद शिव संसार से विरक्त हो गए। वे ऊँचे हिमालय पर जाकर अखंड समाधि में बैठ गए — पर्वत की ही तरह निश्चल।

उधर तारक नाम के असुर ने घोर तप करके ब्रह्मा से वर पाया: उसे केवल शिव का पुत्र ही मार सकेगा। तारक चतुर था। शिव शोक में डूबे तपस्वी थे, जो फिर कभी विवाह नहीं करेंगे — इसलिए, उसने सोचा, वह कभी मरेगा ही नहीं। उसने स्वर्ग जीत लिया, इंद्र को निकाल दिया और देवताओं को अपना सेवक बना लिया।

पर्वत पर पार्वती

पर सती ने पर्वतराज हिमवान और रानी मेना की पुत्री पार्वती के रूप में फिर जन्म लिया था। नारद मुनि ने उनके माता-पिता से कहा कि इस कन्या के भाग्य में शिव की पत्नी बनना लिखा है। तब हिमवान उन्हें उस स्थान पर ले गए जहाँ शिव तप में बैठे थे, और पार्वती प्रतिदिन उनकी सेवा करने लगीं — फूल, जल और कुशा लातीं, भूमि बुहारतीं, प्रतीक्षा करतीं। शिव ने आँखें नहीं खोलीं।

कामदेव युद्ध को चले

निराश देवता प्रेम के देवता कामदेव के पास गए। अपनी पत्नी रति और मित्र वसंत के साथ कामदेव पर्वत की ओर चले — हाथ में गन्ने का धनुष, जिसकी प्रत्यंचा गुनगुनाते भौंरों की पंक्ति थी, और फूलों से बने पाँच बाण।

उनके पहुँचते ही हिमालय पर असमय वसंत छा गया। पेड़ एकाएक फूलों से लद गए। भौंरे गुनगुनाने लगे, कोयल कूकने लगी, बर्फ़ीली हवा कोमल और गुनगुनी हो गई। पर्वत के हर प्राणी ने इसे अनुभव किया। केवल शिव अविचल बैठे रहे।

कामदेव ने अवसर की प्रतीक्षा की। वह क्षण तब आया जब पार्वती शिव को कमल-बीजों की माला अर्पित करने आगे बढ़ीं, और पहली बार उनकी समाधि में हलचल हुई। कामदेव ने धनुष खींचा और अपना सबसे शक्तिशाली बाण छोड़ा — सम्मोहन, मोहित करने वाला बाण।

तीसरा नेत्र

शिव ने बाण का स्पर्श अनुभव किया। एक क्षण के लिए उनका मन पार्वती के मुख की ओर गया। फिर उन्हें भान हुआ कि किसी ने उनके साथ यह किया है — और उन्होंने चारों ओर देखा। उन्हें धनुष ताने छिपे कामदेव दिखे।

शिव के मस्तक के बीच का नेत्र खुल गया। उसमें से एक ज्वाला फूटी। देवता “प्रभु, क्रोध शांत करें!” कह भी न पाए थे कि कामदेव धरती पर राख की ढेरी बन चुके थे।

रति का विलाप

जो राख कभी उनके पति थे, उसके पास रति रोती हुई गिर पड़ीं। उनका शोक इतना गहरा था कि देवताओं ने उनके लिए विनती की। शिव का क्रोध जा चुका था, और उन्होंने वचन दिया कि कामदेव नष्ट नहीं होंगे: अब से वे बिना शरीर के रहेंगे — अनंग, देह-रहित — हर हृदय में उपस्थित। और एक दिन वे फिर शरीर के साथ जन्म लेंगे।

फिर शिव उस स्थान से अंतर्धान हो गए, और पार्वती अकेली खड़ी रह गईं।

पार्वती ने क्या सीखा

पार्वती लज्जित हुईं। उनका सौंदर्य शिव को नहीं जीत सका था; उसने केवल विनाश कराया था। उन्होंने समझा कि शिव तक सौंदर्य या आकर्षण से नहीं पहुँचा जा सकता — केवल उसी से, जो स्वयं शिव के पास है: तप। उन्होंने अपने आभूषण उतार दिए और अपना तप आरंभ करने वन में चली गईं। अगली कथा यहीं से शुरू होती है।

॥ इति ॥

कथा पूर्ण

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यह कथा कहाँ वर्णित है

अध्याय
निश्चित
कालिदास का कुमारसंभव
सर्ग 2–4 (तारक, काम का आगमन, दहन, रति-विलाप)
यह काव्य है, शास्त्र नहीं — पर सबसे प्रसिद्ध वर्णन यही है।
अध्याय
निश्चित
शिव पुराण
रुद्र संहिता, पार्वती खंड, अध्याय 14–19 (तारक: 14–15; काम को भेजना: 17; काम-दहन: 19; “प्रद्युम्न रूप में जन्म तक अनंग”: 19.37–43)
क्रमांकन: गीताप्रेस, गोरखपुर — कल्याण श्रीशिवमहापुराणाङ्क (श्लोकाङ्क सहित हिन्दी अनुवाद)

2 में से 2 स्रोत अध्याय या श्लोक तक निश्चित। यह पृष्ठ अभी किसी संपादक द्वारा समीक्षित नहीं है। हम कैसे जाँचते हैं →

कथा के अलग-अलग रूप

  • कालिदास के काव्य में चौथा सर्ग पूरा का पूरा रति के विलाप को समर्पित है।
  • भागवत पुराण (स्कंध 10) में कामदेव कृष्ण और रुक्मिणी के पुत्र प्रद्युम्न के रूप में फिर शरीर के साथ जन्म लेते हैं।
  • कुछ परंपराएँ इस कथा को होली से जोड़ती हैं, और दक्षिण भारत के कुछ भागों में इस पर्व पर काम-दहन का अभिनय होता है।