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रुद्राक्षमाहात्म्यम्युगों के तप के बाद शिव आँखें खोलते हैं, कुछ बूँदें गिरती हैं — और जहाँ वे गिरती हैं, वहाँ भक्तों के लिए एक वृक्ष उग आता है

रुद्राक्ष: शिव के आँसू

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विद्येश्वर संहिता के अंतिम अध्याय में शिव पार्वती को बताते हैं कि रुद्राक्ष कहाँ से आया: हज़ारों दिव्य वर्षों के तप के बाद उन्होंने आँखें खोलीं, उनसे जल की बूँदें गिरीं, और वे आँसू भक्तों के लिए रुद्राक्ष के वृक्ष बन गए। फिर वे सिखाते हैं कि कौन-से दाने अच्छे हैं, कितने और कहाँ पहने जाते हैं, किन मंत्रों से, और एक से चौदह मुख वाले दाने किसके स्वरूप हैं। बीच में वे यह भी बताते हैं कि यम ने अपने दूतों को भस्म और रुद्राक्ष धारण करने वालों को छोड़ देने का आदेश कैसे दिया।

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कथा कथा — नीचे दिए ग्रंथों के आधार पर, हमारे शब्दों में

पार्वती के लिए एक उपदेश

सूतजी शौनक ऋषि से कहते हैं कि अब वे संक्षेप में रुद्राक्ष की महिमा बताएँगे। रुद्राक्ष, वे कहते हैं, शिव को बहुत प्रिय है और परम पवित्र माना गया है। उसे स्वयं शिव का ही रूप समझना चाहिए; उसका दर्शन, स्पर्श और उस पर किया गया जप सब पापों को हर लेता है।

यह सूतजी का अपना उपदेश नहीं है। वे बताते हैं कि बहुत पहले परमात्मा शिव ने सब लोकों के भले के लिए देवी पार्वती को रुद्राक्ष की महिमा सुनाई थी। आगे वही संवाद है।

शिव सबसे पहले पार्वती को बताते हैं कि वे यह क्यों कह रहे हैं: उनके प्रति प्रेम के कारण, और अपने भक्तों का हित चाहते हुए।

शिव के आँसू

शिव कहते हैं कि बहुत पहले वे मन को संयम में रखकर हज़ारों दिव्य वर्षों तक घोर तप में लगे रहे।

वे कहते हैं कि वे स्वतंत्र परमेश्वर हैं, जो सब लोकों का उपकार करते हैं। और इसलिए उस समय, केवल अपनी लीला से, उन्होंने अपनी दोनों आँखें खोलीं।

आँखें खुलते ही उनके सुंदर नेत्रों से जल की कुछ बूँदें गिरीं। आँसू की उन बूँदों से वहीं रुद्राक्ष नाम के वृक्ष उग आए। भक्तों पर कृपा करने के लिए वे बूँदें एक स्थिर, जड़ जमाए रूप में — वृक्ष के रूप में — बदल गईं। शिव कहते हैं कि फिर उन्होंने वे रुद्राक्ष विष्णु के भक्तों को और चारों वर्णों के लोगों को बाँट दिए।

वृक्ष कहाँ उगे

शिव कहते हैं कि धरती पर उन्होंने अपने प्रिय रुद्राक्ष गौड़ देश में उत्पन्न किए। मथुरा, अयोध्या, लंका, मलय पर्वत, सह्याद्रि, काशी और दूसरे देशों में भी उन्होंने उनके अंकुर उगाए।

ये उत्तम दाने, वे कहते हैं, पापों के उन ढेरों को भी तोड़ देते हैं जो अन्यथा सहे नहीं जा सकते।

रंग, आकार और गुण

पुराण कहता है कि शिव की आज्ञा से रुद्राक्ष धरती पर चार वर्णों के नाम वाली चार श्रेणियों में प्रकट हुए, जिनके रंग श्वेत, लाल, पीला और काला हैं, और लोगों को अपनी श्रेणी का दाना पहनना चाहिए; साथ ही यह भी कि शुभाक्ष नाम के दाने इसी जाति के हैं। अध्याय में आगे यही नियम दोहराया गया है — ब्राह्मणों के लिए श्वेत, क्षत्रियों के लिए गहरा लाल, वैश्यों के लिए पीला, शूद्रों के लिए काला — और इसे वेदोक्त मार्ग कहा गया है। उसी के साथ पाठ यह भी कहता है कि भोग और मोक्ष चाहने वाले चारों वर्णों के लोगों को, और विशेष रूप से शिवभक्तों को, शिव-पार्वती की प्रसन्नता के लिए रुद्राक्ष अवश्य पहनना चाहिए।

आकार के बारे में शिव दो कसौटियाँ देते हैं। पहली: आँवले जितना बड़ा दाना श्रेष्ठ है, बेर जितना मध्यम, और चने जितना निम्न। फिर वे परखने का दूसरा ढंग बताते हैं। बेर जितना दाना छोटा होकर भी उत्तम फल देता है और सुख-सौभाग्य बढ़ाता है; आँवले जितना दाना सब अरिष्टों का नाश करता है; और गुंजा के बीज जैसा बहुत छोटा दाना हर मनोरथ सिद्ध करता है। वे कहते हैं कि रुद्राक्ष जितना छोटा हो, उतना अधिक फल देता है — विद्वानों के अनुसार एक छोटा दाना बड़े दाने से दस गुना फल देता है। आगे चलकर वे कहते हैं कि सूक्ष्म, छोटा रुद्राक्ष ही सदा प्रशंसनीय है।

अच्छे दाने आकार-प्रकार में एक-से, चिकने, मज़बूत, भरे हुए, उभरे दानों वाले और सुंदर होते हैं; ऐसे दाने मनचाही वस्तु देते हैं और भोग तथा मोक्ष दोनों देते हैं। छह प्रकार के दाने छोड़ देने चाहिए: कीड़ों के बिगाड़े हुए, टूटे हुए, फूटे हुए, बिना उभरे दानों वाले, घाव वाले, और जो ठीक से गोल न हों।

शिव कहते हैं कि जिस दाने में धागा पिरोने का छेद अपने आप बना हो, वही उत्तम है। जिसमें छेद मनुष्य के प्रयत्न से किया गया हो, वह मध्यम श्रेणी का है।

कितने, और कहाँ

शिव कहते हैं कि रुद्राक्ष पहनना बड़े-बड़े पापों का भी नाश करता है। जो ग्यारह सौ रुद्राक्ष धारण करता है, वह रुद्र का ही स्वरूप हो जाता है, और उसका फल सैकड़ों वर्षों में भी नहीं कहा जा सकता। वे कहते हैं कि यह मंगलमय माला जो देती है, वैसा देने वाली दूसरी कोई माला नहीं दिखती।

वे पूरा श्रृंगार बताते हैं। भक्त साढ़े पाँच सौ दानों का मुकुट बना सकता है, और तीन सौ साठ दानों को लंबे धागे में पिरोकर एक हार — ऐसे तीन हार मिलकर यज्ञोपवीत बनते हैं।

फिर वे शरीर के हर अंग के लिए संख्या बताते हैं: शिखा में तीन, हर कान पर छह, कंठ में एक सौ एक, हर भुजा पर ग्यारह, हर कुहनी और हर कलाई पर फिर ग्यारह, यज्ञोपवीत में तीन, और कमर पर गुप्त रूप से पाँच। जो इन संख्याओं में रुद्राक्ष पहनता है, वे कहते हैं, वह देखने में शंकर के समान हो जाता है, सबके प्रणाम और स्तुति के योग्य। ऐसा व्यक्ति जब आसन लगाकर ध्यान से शिव का नाम जपता है, तो पाप अपने आप उसे छोड़कर भाग जाते हैं।

जिन्हें इतने दाने न मिल सकें, उनके लिए शिव दूसरी विधि बताते हैं: शिखा में एक, सिर पर तीस, गले में पचास, हर भुजा पर सोलह, कलाइयों पर बारह, कंधों पर पाँच सौ, और एक सौ आठ दानों की माला यज्ञोपवीत के रूप में। जो दृढ़ निश्चय से इस तरह एक हज़ार धारण करता है, वह रुद्र का स्वरूप है, और देवता उसे वैसे ही नमन करते हैं जैसे शिव को।

और एक तीसरी, और भी हल्की विधि: शिखा में एक, मस्तक पर चालीस, कंठ में बत्तीस, छाती पर एक सौ आठ, हर कान में एक, हर बाजूबंद में छह या सोलह, हाथों में उसका दुगुना — या बस जितने प्रेम से मन चाहे। शिव कहते हैं कि ऐसा करने वाला भक्त शिव के समान पूजनीय और वंदनीय हो जाता है, जिसे लोग बार-बार देखना चाहें।

मंत्र, आहार और कौन पहने

दाने मंत्रों के साथ पहने जाते हैं। सिर पर ईशान मंत्र से; कानों में तत्पुरुष मंत्र से; गले और हृदय पर अघोर मंत्र से; दोनों हाथों में अघोर बीजमंत्र से; और पेट पर वामदेव मंत्र से पंद्रह दानों की माला। सद्योजात आदि पाँच ब्रह्म-मंत्रों और अंग-मंत्रों से तीन, पाँच या सात मालाएँ पहनी जा सकती हैं — या सब दाने केवल मूल मंत्र से ही पहने जा सकते हैं।

शिव कहते हैं कि रुद्राक्ष पहनने वाले को मदिरा, मांस, लहसुन, प्याज़, सहजन, लिसोड़ा और गाँव के सूअर का मांस छोड़ देना चाहिए।

कौन पहने? ब्रह्मचारी, गृहस्थ, वानप्रस्थ और संन्यासी — सबको नियम से पहनना चाहिए और इसके बिना नहीं रहना चाहिए। शिव इसे परम रहस्य कहते हैं: इसे पहनने का सौभाग्य बड़े पुण्य से मिलता है, और पाठ कहता है कि इसे त्याग देने वाला नरक को जाता है। हर आश्रम और हर वर्ण के लोगों को, स्त्रियों और शूद्रों को भी, शिव की आज्ञा से सदा रुद्राक्ष पहनना चाहिए; संन्यासियों के लिए प्रणव, ॐ, का उच्चारण करते हुए पहनने का विधान है।

शिव उमा से कहते हैं कि रुद्राक्ष उनका अपना मंगलमय लिंग-स्वरूप है। जो दाने रोगी हों, बिना उभरे दानों के हों, कीड़ों के खाए हों या जिनमें धागे का छेद न हो, उन्हें कल्याण चाहने वालों को नहीं पहनना चाहिए।

यम का अपने दूतों को आदेश

शिव कहते हैं कि दिन में रुद्राक्ष पहनने से मनुष्य रात के पापों से छूट जाता है, और रात में पहनने से दिन के पापों से; वैसे ही सुबह, दोपहर और शाम को भी। इस संसार में जो त्रिपुंड्र, यानी भस्म की तीन रेखाएँ, धारण करते हैं, जटा रखते हैं और रुद्राक्ष पहनते हैं, वे यमलोक नहीं जाते।

यहाँ अध्याय एक छोटा-सा दृश्य देता है। यम अपने गणों को आदेश देते हैं। वे कहते हैं: जिनके ललाट पर त्रिपुंड्र हो, जिनके सब अंग रुद्राक्ष से सजे हों और जो पंचाक्षर मंत्र जप रहे हों, वे तुम जैसों के लिए पूज्य हैं; वे सचमुच साधु हैं। जिसके शरीर पर रुद्राक्ष नहीं, माथे पर त्रिपुंड्र नहीं और मुख में “ॐ नमः शिवाय” नहीं, उसे मेरे लोक में ले आओ। पर जो भस्म और रुद्राक्ष धारण करते हैं, वे उसका प्रभाव जानते हों या न जानते हों, हमारे लिए सदा पूज्य हैं। उन्हें यहाँ नहीं लाना है।

काल ने भी अपने गणों को यही आदेश दिया। गण चकित होकर बोले “ऐसा ही होगा”, और चुप हो गए।

पहनने वाले के लिए पुराण का वचन

इसलिए, शिव पार्वती से कहते हैं, रुद्राक्ष पापों का नाश करने वाला है। उसे पहनने वाला, पापी होकर भी, उन्हें प्रिय है और शुद्ध है। जो उसे हाथ, भुजाओं और सिर पर धारण करता है, उसे कोई प्राणी मार नहीं सकता और वह धरती पर रुद्र का रूप होकर विचरता है — देवताओं और असुरों दोनों के लिए सदा वंदनीय, और शिव की तरह अपने दर्शन करने वाले के पापों का नाश करने में समर्थ। जो ध्यान और ज्ञान से रहित होकर भी रुद्राक्ष पहनता है, वह सब पापों से छूटकर परम गति पाता है।

पाठ कहता है कि रुद्राक्ष पर किया गया जप मणि आदि पर किए जप से करोड़ गुना पुण्य देता है, और उसे पहनना दस करोड़ गुना। पुराण कहता है कि जब तक यह दाना शरीर पर रहता है, तब तक अकाल मृत्यु उस व्यक्ति को बाधा नहीं देती। त्रिपुंड्र लगाए, रुद्राक्ष से सजे और मृत्युंजय मंत्र जपते हुए व्यक्ति को देखना स्वयं रुद्र के दर्शन का फल पाना है।

और यह दाना केवल शैवों के लिए नहीं है। शिव कहते हैं कि पाँच देवताओं को पूजने वाले और सब देवताओं से प्रेम रखने वाले लोग रुद्राक्ष की माला पर किसी भी मंत्र का जप कर सकते हैं। विष्णु आदि देवताओं के भक्तों को भी इसे निस्संकोच पहनना चाहिए — और रुद्र के भक्तों के लिए तो यह विशेष रूप से आवश्यक है।

एक से चौदह मुख वाले दाने

शिव कहते हैं कि रुद्राक्ष कई प्रकार के हैं, और अब वे उन्हें उनके मुखों की संख्या से गिनाते हैं। हर प्रकार भोग और मोक्ष देता है। यह सूची ठीक वैसी है जैसी अध्याय में दी गई है।

एक मुख: स्वयं शिव। यह भोग और मोक्ष देता है, और इसके दर्शन मात्र से ब्रह्महत्या का पाप दूर हो जाता है। जहाँ इसकी पूजा होती है, वहाँ से लक्ष्मी दूर नहीं रहतीं, उस स्थान के सब उपद्रव मिट जाते हैं, और हर कामना पूरी होती है।

दो मुख: देवदेवेश कहलाता है, देवों के देव का ईश्वर। यह सब कामनाएँ और फल देता है, और विशेष रूप से गोवध के पाप को शीघ्र नष्ट करता है।

तीन मुख: यह सदा साधना का फल देता है, और इसके प्रभाव से सब विद्याएँ दृढ़ता से स्थिर हो जाती हैं।

चार मुख: स्वयं ब्रह्मा। यह मनुष्य-हत्या के पाप को दूर करता है, और दर्शन तथा स्पर्श से शीघ्र ही चारों पुरुषार्थ — धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष — देता है।

पाँच मुख: स्वयं रुद्र, कालाग्नि नाम से। यह सब कुछ करने में समर्थ है, हर प्रकार की मुक्ति और हर मनचाहा फल देता है, और अगम्या-गमन तथा अभक्ष्य-भक्षण जैसे पापों को दूर करता है।

छह मुख: कार्तिकेय। दाहिनी भुजा पर पहनने से यह पहनने वाले को ब्रह्महत्या आदि पापों से मुक्त करता है — पाठ कहता है, इसमें संदेह नहीं।

सात मुख: अनंग नाम से प्रसिद्ध। इसे पहनने से दरिद्र भी ऐश्वर्यवान हो जाता है।

आठ मुख: अष्टमूर्ति भैरव। इसे पहनने से मनुष्य पूरी आयु पाता है और मृत्यु के बाद शूलधारी — शिव के समान — हो जाता है।

नौ मुख: भैरव और कपिल मुनि; अथवा इसकी अधिष्ठात्री नौ रूपों वाली महेश्वरी दुर्गा हैं। शिव कहते हैं कि जो इसे भक्ति से बाएँ हाथ में पहनता है, वह उन्हीं के समान सर्वेश्वर हो जाता है।

दस मुख: देव जनार्दन, स्वयं विष्णु। इसे पहनने से सब कामनाएँ प्राप्त होती हैं।

ग्यारह मुख: रुद्र। इसे पहनने से मनुष्य सर्वत्र विजयी होता है।

बारह मुख: इसे केशों में पहनना चाहिए। तब मानो बारहों आदित्य, सूर्य, वहाँ विराजमान हो जाते हैं।

तेरह मुख: विश्वेदेव। इसे पहनकर मनुष्य हर कामना, सौभाग्य और मंगल पाता है।

चौदह मुख: परम शिव। इसे भक्ति से मस्तक पर पहनना चाहिए, और सब पाप नष्ट हो जाते हैं।

हर एक का मंत्र, और समापन

फिर शिव क्रम से वह मंत्र बताते हैं जिससे हर दाना पहना जाता है। अध्याय की सूची के अनुसार: एक मुख के लिए “ॐ ह्रीं नमः”; दो के लिए “ॐ नमः”; तीन के लिए “क्लीं नमः”; चार और पाँच के लिए “ॐ ह्रीं नमः”; छह के लिए “ॐ ह्रीं हुं नमः”; सात और आठ के लिए “ॐ हुं नमः”; नौ के लिए “ॐ ह्रीं हुं नमः”; दस के लिए “ॐ ह्रीं नमः”; ग्यारह के लिए “ॐ ह्रीं हुं नमः”; बारह के लिए “ॐ क्रौं क्षौं रौं नमः”; तेरह के लिए “ॐ ह्रीं नमः”; चौदह के लिए “ॐ नमः”। साधक को नींद और आलस्य छोड़कर, श्रद्धा और भक्ति के साथ, हर दाने को उसके मंत्र से पहनना चाहिए। इसके उलटे के बारे में पाठ कठोर है: वह कहता है कि जो बिना मंत्र के रुद्राक्ष पहनता है, वह चौदह इंद्रों के काल तक घोर नरक में जाता है।

पुराण कहता है कि रुद्राक्ष की माला पहने व्यक्ति को देखकर भूत, प्रेत, पिशाच, डाकिनी, शाकिनी और दूसरे द्रोही प्राणी सब दूर भाग जाते हैं, और उस पर किए गए अभिचार कर्म डरकर लौट जाते हैं। और उसी को देखकर स्वयं शिव, विष्णु, दुर्गा, गणेश, सूर्य और दूसरे देवता प्रसन्न होते हैं। शिव निष्कर्ष देते हैं कि इस महिमा को जानकर धर्म की वृद्धि के लिए रुद्राक्ष को विधिपूर्वक, भक्ति से और मंत्रों के साथ पहनना चाहिए।

अब सूतजी फिर अपनी ओर से बोलते हैं। वे ऋषियों से कहते हैं कि इस तरह शिव ने पार्वती को भस्म और रुद्राक्ष की वह महिमा सुनाई जो भोग और मोक्ष देती है। इन दोनों को धारण करने वाले शिव को बहुत प्रिय हैं। जो इन्हें पहनता है, वह शिवभक्त कहलाता है; जो इन्हें पहनकर “ॐ नमः शिवाय” जपता है, वह पूर्ण भक्त कहलाता है। और पाठ कहता है कि भस्म के त्रिपुंड्र और रुद्राक्ष की माला के बिना की गई पूजा का मनचाहा फल महादेव नहीं देते।

सूतजी कहते हैं कि जो रुद्राक्ष और भस्म की इस महिमा को भक्ति से सुनता है, उसकी हर कामना पूरी होती है, वह पुत्र-पौत्रों के साथ इस लोक में सब सुख भोगता है, अंत में मोक्ष पाता है और शिव का अत्यंत प्रिय हो जाता है। इसी के साथ, वे ऋषियों से कहते हैं, विद्येश्वर संहिता पूरी होती है।

॥ इति ॥

कथा पूर्ण

अर्पण

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विचार

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एक पंक्ति, एक स्मृति, एक प्रश्न — इसने आपके मन में जो जगाया, वह साझा कीजिए। भेजते ही यह यहाँ दिखेगा।

यह कथा कहाँ वर्णित है

अध्याय
निश्चित
शिव पुराण
विद्येश्वर संहिता, अध्याय 25 — रुद्राक्ष-धारण की महिमा और उसके भेद (सूतजी द्वारा शिव-पार्वती संवाद की भूमिका: 25.1–4; शिव का तप, आँसू और रुद्राक्ष के वृक्ष: 25.5–8; वृक्ष कहाँ उगे: 25.9–10; चार श्रेणियाँ और रंग: 25.11–13, 25.44; दानों का आकार और गुण: 25.14–23, 25.46; शरीर के हर अंग पर संख्या: 25.24–39; धारण के मंत्र, वर्जित आहार, कौन पहने: 25.40–47; यम का अपने गणों को आदेश: 25.48–53; धारण और जप के फल: 25.54–62; एक से चौदह मुख वाले दाने: 25.63–80; हर एक का मंत्र और मंत्र सहित धारण का नियम: 25.81–87; सूतजी का समापन और फलश्रुति: 25.88–95)
क्रमांकन: गीताप्रेस, गोरखपुर — कल्याण श्रीशिवमहापुराणाङ्क (श्लोकाङ्क सहित हिन्दी अनुवाद)
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कथा के अलग-अलग रूप

  • अध्याय आकार की दो कसौटियाँ देता है जो उलटी दिशाओं में जाती हैं: पहले सबसे बड़ा दाना (आँवले जितना) श्रेष्ठ और चने जितना निम्न, फिर “दाना जितना छोटा, फल उतना बड़ा”। पाठ दूसरी को परखने का एक और ढंग कहकर रखता है और दोनों को मिलाता नहीं।
  • पूरे श्रृंगार की संख्याएँ ठीक-ठीक नहीं जुड़तीं। कुल ग्यारह सौ दाने कहे गए हैं, पर 550 का मुकुट और 360 के तीन हार, और उसके बाद अंग-अंग की संख्याएँ, अलग-अलग जोड़ देती हैं। हमने हर सूची वैसी ही दी है जैसी अध्याय में है।
  • अध्याय दोनों बातें कहता है — कि हर वर्ण को एक विशेष रंग का दाना पहनना चाहिए, और यह भी कि हर वर्ण और आश्रम के लोगों को, स्त्रियों सहित, तथा विष्णु और दूसरे देवताओं के भक्तों को भी रुद्राक्ष पहनना चाहिए। पाठ दोनों को बिना टिप्पणी के रखता है।
  • हर मुख के अधिष्ठाता देवता की सूचियाँ ग्रंथ-ग्रंथ में और आज के प्रचलन में अलग-अलग मिलती हैं — जैसे कई प्रचलित सूचियाँ तीन मुख वाले दाने को अग्नि का और सात मुख वाले को दूसरे देवताओं का बताती हैं। यहाँ की सूची शिव पुराण की अपनी है: तीन मुख वाले दाने के लिए वह कोई देवता नहीं, केवल फल बताता है।